Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 11

65 Mantra
23/11
Devata- जिज्ञासुर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
का स्वि॑दासीत् पू॒र्वचि॑त्तिः॒ किस्वि॑दासीद् बृ॒हद्वयः॑। का स्वि॑दासीत् पिलिप्पि॒ला का स्वि॑दासीत् पिशङ्गि॒ला॥११॥

का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पू॒र्वचि॑त्ति॒रिति॑ पू॒र्वऽचि॑त्तिः॒। किम्। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। बृ॒हत्। वयः॑। का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पि॒लि॒प्पि॒ला। का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पि॒श॒ङ्गि॒ला ॥११ ॥

Mantra without Swara
का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः किँ स्विदासीद्बृहद्वयः । का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला ॥

का। स्वित्। आसीत्। पूर्वचित्तिरिति पूर्वऽचित्तिः। किम्। स्वित्। आसीत्। बृहत्। वयः। का। स्वित्। आसीत्। पिलिप्पिला। का। स्वित्। आसीत्। पिशङ्गिला॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्रों के अनुसार ही इन मन्त्रों में भी चार प्रश्न व उत्तर दिये गये हैं। प्रथम प्रश्न है (स्वित्) = भला (पूर्वचित्तिः) = सबसे प्रथम [प्रथमा स्मृतिविषया- द०] स्मरण व ध्यान की वस्तु का क्या है? अर्थात् सबसे अधिक ध्यान किसपर देना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (द्यौः) = मस्तिष्क (पूर्वचित्तिः) = सबसे प्रथम ध्यान देने का विषय (आसीत्) = है । शरीर में मस्तिष्क उसी प्रकार सर्वोपरि स्थित है जैसे विराट् शरीर में द्युलोक। ('मूर्ध्ना द्यौः') = विराट् शरीर के मस्तिष्क से ही द्युलोक बनता है और यही द्युलोक मस्तिष्करूप से हमारे शरीर में निवास करता है। हमें इस मस्तिष्क का सर्वाधिक ध्यान करना है। । २. दूसरा प्रश्न है (स्वित्) = भला (बृहद् वयः) = वर्धनशील पक्षी (किम्) = कौन है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अश्वः) = [अश्नुते कर्मसु ] सदा कर्मों में व्याप्त होनेवाला जीव ही (बृहद् वयः) = वर्धनशील पक्षी (आसीत्) = है । वैदिक साहित्य में आत्मा तथा परमात्मा दोनों को ('द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया') = इन शब्दों में सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षियों के रूप में चित्रित किया है। इनमें परमात्मा सदावृद्ध व निरतिशय वृद्धिवाले हैं, जीवात्मा अल्प है और यह साधना के मार्ग पर चलकर वृद्धि को प्राप्त करनेवाला है। यह बढ़ता हुआ पक्षी है। जितना जितना बढ़ता जाता है उतना उतना प्रभु के समीप पहुँचता जाता है अथवा जितना - जितना प्रभु के समीप पहुँचता जाता है उतना उतना बढ़ता जाता है । ३. तीसरा प्रश्न है (स्वित्) = भला (पिलिप्पिला) = [आर्द्रीभूता-चिक्कणा - शोभन - द० ] [ श्रीर्वै पिलिप्पिला - श० १३/२/६/१६] आर्द्रीभूत, चिक्कणा व शोभना श्री क्या (आसीत्) = है ? उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अवि:) = [अव रक्षणे] रोगों व वासनाओं से अपना रक्षण करनेवाला जीव ही (पिलिप्पिला) = शरीर में स्वास्थ्य की स्निग्धता से चिक्कण, मन में करुणा से आर्द्रीभूत, मस्तिष्क में उत्तम विचारों से शोभन श्रीवाला आसीत् है । जब हम आधि-व्याधियों से अपने को बचाते हैं तभी हमारे शरीर, मन व मस्तिष्क श्रीसम्पन्न होते हैं। ४. चौथा प्रश्न है (स्वित्) = भला (पिशंगिला) = [पिशं रूपं गिलति] रूप को निगल जानेवाला का (आसीत्) = कौन है ? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (रात्रिः) = रात (पिशंगिला आसीत्) = रूप को निगल जानेवाली है। रात्रि में सब वर्ण समाप्त होकर एक कृष्ण ही कृष्ण वर्ण की प्रतीति होती है। इसी प्रकार उस परमेश्वर में रमण करनेवाले [रात्रि: रमयित्री] योगनिद्रागत योगी के इन शरीररूप रूपों का, वल्बों का विलय मोक्ष हो जाता है। इस योगी को फिर दीर्घकाल तक शरीर नहीं लेना पड़ता ।
Essence
भावार्थ- सर्वाधिक ध्यान हमें मस्तिष्क का करना है। साधना के द्वारा निरन्तर वृद्धि का यत्न करना है। अपने को आधि-व्याधियों से बचाकर श्रीसम्पन्न होना है तथा प्रभुस्मरण के द्वारा इन शरीरों के परिग्रह से ऊपर उठना है।
Subject
पिलिप्पिला- पिशंगिला