Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 8

34 Mantra
22/8
Devata- प्रयत्नवन्तो जीवादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिग्धृतिः, भुरिगतिधृतिः Swara- ऋषभः, षड्जः
Mantra with Swara
य॒ते स्वाहा॒ धाव॑ते॒ स्वाहो॑द्द्रा॒वाय॒ स्वाहोद्द्रु॑ताय॒ स्वाहा॑ शूका॒राय॒ स्वाहा॒ शूकृ॑ताय॒ स्वाहा॒ निष॑ण्णाय॒ स्वाहोत्थि॑ताय॒ स्वाहा॑ ज॒वाय॒ स्वाहा॒ बला॑य॒ स्वाहा॑ वि॒वर्त्त॑मानाय॒ स्वाहा॒ विवृ॑त्ताय॒ स्वाहा॑ विधून्वा॒नाय॒ स्वाहा॒ विधू॑ताय॒ स्वाहा॒ शुश्रू॑षमाणाय॒ स्वाहा॑ शृण्व॒ते स्वाहेक्ष॑माणाय॒ स्वाहे॑क्षि॒ताय॒ स्वाहा॒ वीक्षिताय॒ स्वाहा॑ निमे॒षाय॒ स्वाहा॒ यदत्ति॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ यत् पिब॑ति॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ यन्मूत्रं॑ क॒रोति॒ तस्मै॒ स्वाहा॑ कुर्व॒ते स्वाहा॑ कृ॒ताय॒ स्वाहा॑॥८॥

य॒ते। स्वाहा॑। धाव॑ते। स्वाहा॑। उ॒द्द्रा॒वायेत्यु॑त्ऽद्रा॒वाय॑। स्वाहा॑। उद्द्रु॑ता॒येत्युत्ऽद्रु॑ताय। स्वाहा॑। शू॒का॒राय॑। स्वाहा॑। शूकृ॑ताय। स्वाहा॑। निष॑ण्णाय। निस॑न्ना॒येति॒ निऽस॑न्नाय। स्वाहा॑। उत्थि॑ताय। स्वाहा॑। ज॒वाय॑। स्वाहा॑। बला॑य। स्वाहा॑। वि॒वर्त्त॑माना॒येति॑ वि॒ऽवर्त्त॑मानाय। स्वाहा॑। विवृ॑त्तायेति॒ विऽवृ॑त्ताय। स्वाहा॑। वि॒धू॒न्वा॒नायेति॑ विधून्वा॒नाय॑। स्वाहा॑। विधू॑ता॒येति॒ विऽधूता॒य। स्वाहा॑। शुश्रू॑षमाणाय। स्वाहा॑। शृ॒ण्व॒ते। स्वाहा॑। ईक्ष॑माणाय। स्वाहा॑। ई॒क्षि॒ताय॑। स्वाहा॑। वीक्षि॑ता॒येति॒ विऽईक्षि॑ताय। स्वाहा॑। नि॒मे॒षायेति॑ निऽमे॒षाय॑। स्वाहा॑। यत्। अत्ति॑। तस्मै॑। स्वाहा॑। यत्। पिब॑ति। तस्मै॑। स्वाहा॑। यत्। मूत्र॑म्। क॒रोति॑। तस्मै॑। स्वाहा॑। कु॒र्वते॑। स्वाहा॑। कृ॒ताय॑। स्वाहा॑ ॥८ ॥

Mantra without Swara
यते स्वाहा धावते स्वाहोद्द्रावाय स्वाहोद्द्रुताय स्वाहा शूकाराय स्वाहा शूकृताय स्वाहा निषणाय स्वाहोत्थिताय स्वाहा जवाय स्वाहा बलाय स्वाहा विवर्तमानाय स्वाहा विवृत्ताय स्वाहा विधून्वानाय स्वाहा विधूताय स्वाहा शुश्रूषमाणाय स्वाहा शृण्वते स्वाहेक्षमाणाय स्वाहेक्षिताय स्वाहा वीक्षिताय स्वाहा निमेषाय स्वाहा यदत्ति तस्मै स्वाहा यत्पिबति तस्मै स्वाहा यन्मूत्रङ्करोति तस्मै स्वाहा कुर्वते स्वाहा कृताय स्वाहा ॥

यते। स्वाहा। धावते। स्वाहा। उद्द्रावायेत्युत्ऽद्रावाय। स्वाहा। उद्द्रुतायेत्युत्ऽद्रुताय। स्वाहा। शूकाराय। स्वाहा। शूकृताय। स्वाहा। निषण्णाय। निसन्नायेति निऽसन्नाय। स्वाहा। उत्थिताय। स्वाहा। जवाय। स्वाहा। बलाय। स्वाहा। विवर्त्तमानायेति विऽवर्त्तमानाय। स्वाहा। विवृत्तायेति विऽवृत्ताय। स्वाहा। विधून्वानायेति विधून्वानाय। स्वाहा। विधूतायेति विऽधूताय। स्वाहा। शुश्रूषमाणाय। स्वाहा। शृण्वते। स्वाहा। ईक्षमाणाय। स्वाहा। ईक्षिताय। स्वाहा। वीक्षितायेति विऽईक्षिताय। स्वाहा। निमेषायेति निऽमेषाय। स्वाहा। यत्। अत्ति। तस्मै। स्वाहा। यत्। पिबति। तस्मै। स्वाहा। यत्। मूत्रम्। करोति। तस्मै। स्वाहा। कुर्वते। स्वाहा। कृताय। स्वाहा॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. छठे मन्त्र के अनुसार स्वार्थत्याग करने पर व प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने पर अग्नि आदि तत्त्वों के शरीर में विकसित होने का उल्लेख था। अब सातवें व आठवें मन्त्र में उसी प्रकार स्वार्थत्याग से व प्रभु के प्रति अर्पण से शरीर में उननचास मरुतों व प्राणभेदों के ठीक से कार्य चलने का उल्लेख करते हैं। शरीर में ये प्राणवायु भिन्न-भिन्न रूप में होकर सारे शरीर की विविध क्रियाओं को सिद्ध करती है। ये भेद उननचास हैं-अतः ये प्राण= मरुत उननचास कहलाते हैं। इन उननचास मरुतों की क्रियाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि १. (हिङ्काराय स्वाहा) = [शुक्लमेव हिङ्कारः । जै०उ० १।३४।१] अपने जीवन को शुक्ल बनाने के लिए मैं स्वार्थत्याग करता हूँ। स्वार्थ ही मलिनता है। इसके त्याग से मेरा जीवन शुद्ध होता है। उठने पर सबसे पूर्व शोधन ही आवश्यक होता है, अत: इस शोध से ही मन्त्र को प्रारम्भ किया गया है। 'प्राणो वै हिङ्कारः' [श० ४।२।२।११] । प्राणशक्ति की वृद्धि के लिए मैं स्वार्थभाव से ऊपर उठता हूँ। स्वार्थभाव में भोगप्रवणता बढ़ती है और प्राणशक्ति का ह्रास होता है। 'वज्रो हिङ्कारः' [कौ० ३।२ ] । प्राणशक्ति की वृद्धि के द्वारा मैं अपने इस शरीर को वज्रतुल्य बनाता हूँ। २. (हिङ्कृताय स्वाहा) = जिसने अपना शोधन कर लिया है, प्राणशक्ति की वृद्धि की है तथा शरीर को वज्रतुल्य बनाया है, उसके लिए हम [सु+आह] शुभ शब्द बोलते हैं, प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं । ३. (क्रन्दते) = [क्रदि आह्वाणे] प्रभु को पुकारनेवाले का स्वाहा-हम आदर करते हैं । ४. (अवक्रन्दाय) = प्रभु को नीचे-अपने अन्दर बुलाने के लिए हम स्वाहा स्वार्थत्याग करते हैं। प्रातः उठकर शोधन की प्रक्रिया के बाद प्रभु का स्मरण व स्तवन ही चलना चाहिए। इस प्रभु के आह्वान से हमें शुद्ध बनने में सहायता मिलती है । ५. (प्रोथते) = [ प्रोथ पर्यापणे subdue, overcome] प्रभु स्मरण के द्वारा कामादि शत्रुओं का विजय करनेवाले के लिए हम स्वाहा आदर के शब्द बोलते हैं। ६. (प्रप्रोथाय स्वाहा) = वासना - विजय के प्रकृष्ट कार्य के लिए, इन शत्रुओं को जीतने की क्षमता प्राप्त करने के लिए मैं स्वार्थत्याग करता हूँ। ७. अब प्रभु स्मरण के पश्चात् स्वाध्याय का क्रम आता है। उस स्वाध्याय में मैं विज्ञान के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करता हूँ अथवा विज्ञान के द्वारा प्रभु के साथ सम्बन्ध जोड़ता हूँ। इस (गन्धाय स्वाहा) = ज्ञान की गन्ध के लिए मैं स्वार्थत्याग करता हूँ। स्वार्थ से ऊपर उठकर ही मैं अपनी बुद्धि को शुद्ध करता हूँ और अपने में ज्ञान का सम्बन्ध कर पाता हूँ। ८. (घ्राताय स्वाहा) = इस ज्ञान-गन्ध का ग्रहण करनेवाले के लिए मैं आदरभाव धारण करता हूँ। ९. स्वाध्यायानन्तर निविष्टाय-अपने कार्यों में लग जानेवाले पुरुष के लिए मैं (स्वाहा) = शुभ शब्द बोलता हूँ। १०. इन कार्यों को करते समय (उपविष्टाय स्वाहा) = सदा प्रभु के समीप स्थित के लिए मैं आदर के शब्द कहता हूँ। ११. इन कार्यों को करते हुए (सन्दिताय स्वाहा) = [सम्यक् दितं खण्डनं यस्य सः] वासनाओं व आलस्य की भावना का सम्यक् खण्डन करनेवाले के लिए हम आदर करते हैं। १२. (वल्गते स्वाहा) = आलस्य को छोड़कर मधुरता से गति करते हुए का हम आदर करते हैं। १३. आसीनाय स्वाहा कर्म करने के बाद अब आराम के लिए बैठे हुए के लिए हम शुभ शब्द बोलते हैं। १४. (शयानाय स्वाहा) = लेटनेवाले के लिए हम शुभ शब्द बोलते हैं। १५. (स्वपते स्वाहा) = सोनेवाले के लिए हम शुभ शब्द कहते हैं । १६. अब सोने के बाद (जाग्रते स्वाहा) = जागनेवाले के लिए हम शुभ शब्द बोलते हैं । १७. (कूजते स्वाहा) = जागने के बाद अव्यक्त रूप में, मानस जप के रूप में प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाले का हम आदर करते हैं १८. (प्रबुद्धाय स्वाहा) = अब खूब अच्छी प्रकार जागरित हो गये के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। १९. (विजृम्भमाणाय स्वाहा) = अब गात्रों का विविध नयन करनेवाले के लिए, अर्थात् सब अङ्ग-प्रत्यङ्गों को फैलानेवाले के लिए हम शुभ शब्द बोलते हैं । २०. (विचृताय) = [ चृती दीप्तौ ] गात्रविनाम के द्वारा दीप्त होनेवाले का हम आदर करते हैं । २१. (संहानाय) = 'अत्रा जहाम अशिवा ये असन्' इस मन्त्रभाग की भावना के अनुसार अशिव को छोड़नेवाले का हम आदर करते हैं। २२. (उपस्थिताय स्वाहा) = अशुभ को छोड़कर प्रभु के समीप पहुँचे हुए का हम आदर करते हैं। २३. (अयनाय स्वाहा) = [अयते] प्रभु की ओर जानेवाले का हम आदर करते हैं । २४. (प्रायणाय स्वाहा) = [प्रकृष्टमयते] सदा प्रकृष्ट मार्ग से जानेवाले का हम आदर करते हैं। २५. (यते स्वाहा) = गतिशील का हम आदर करते हैं। २६. (धावते स्वाहा) = गतिशीलता के द्वारा अपना शोधन करनेवाले का हम आदर करते हैं । २७. (उद्भावाय स्वाहा) = उत्कृष्ट गतिवाले का हम आदर करते हैं । २८. (उद्द्रुताय) = जो विषयों से (उत्) = ऊपर [out] उठ गया है, उसका हम आदर करते हैं। २९. (शूकाराय स्वाहा) = शीघ्रता से कार्यों को करनेवाले के लिए हम शुभ शब्द कहते हैं । ३०. (शूकृताय स्वाहा) = शीघ्रता से शिक्षित हुए का हम आदर करते हैं । ३१. (निषण्णाय) = अपने कार्यों में निश्चित रूप से स्थित का हम आदर करते हैं। ३२. (उत्थिताय स्वाहा) = उठ खड़े हुए के लिए, अर्थात् सदा कार्यों में उद्युक्त का हम आदर करते हैं । ३३. (जवाय) = वेगवान् के लिए, क्रियाओं में गतिवाले का हम आदर करते हैं । ३४. (बलाय स्वाहा) = क्रियाओं में सतत वेग के द्वारा उत्पन्न बल के लिए हम स्वार्थत्याग करते हैं। आलस्य आराम को छोड़कर प्रबलता से कर्मों को करनेवाला ही सबल बनता है। ३५. (विवर्त्तमानाय) = विशिष्ट रूप से क्रियाओं में चेष्टा करनेवाले का हम आदर करते हैं। ३६. (विवृत्ताय) = विशिष्ट वर्तन के कारण जो उत्कृष्ट चरित्रवाला बना है [विशिष्टं वृतं यस्य ] उसके लिए हम आदर करते हैं । ३७. (विधूवानाय स्वाहा) जो विशिष्ट वृत्तवाला बनकर बुराइयों को अपने से कम्पित करके दूर कर रहा है, उसके लिए शुभ शब्द कहते हैं । ३८. (विधूताय स्वाहा) = बुराइयों को कम्पित करते हुए जो 'विधूतपाप्मा' बन गया है, उसका हम आदर करते हैं। ३९. (शुश्रूषमाणाय स्वाहा) = विधूतपाप्मा बनने के लिए गुरुओं का उपदेश सुनने की इच्छावालों का तथा गुरुओं का उपासन करनेवाले का हम आदर करते हैं। ४०. (शृण्वते स्वाहा) = गुरुओं के उपदेश को सुननेवाले का लिए हम आदर करते हैं। ४१. (ईक्षमाणाय स्वाहा) = ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रकृति का सूक्ष्मता से निरीक्षण करनेवाले का हम आदर करते हैं। ४२. (ईक्षिताय स्वाहा) = प्रकृति के तत्त्वों के द्रष्टा का हम आदर करते हैं। ४३. (वीक्षिताय स्वाहा) = वीक्षित का ठीक conecption बनानेवाले का हम आदर करते हैं। ४४. इस प्रकृति - निरीक्षण के बाद (निमिषाय स्वाहा) = आँख आदि के व्यापार को रोककर अन्तःस्थित आत्मतत्त्व को देखनेवाले का हम आदर करते हैं। ४५. (यत् अत्ति तस्मै स्वाहा) = आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए शरीर को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से जो खाता है, सात्त्विक भोजन करता है, अन्न का सेवन करता है उसका हम आदर करते हैं। ४६. (यत् पिबति तस्मै स्वाहा) = इसी उद्देश्य से जो सात्त्विक दूध आदि का पान करता है, उसका हम आदर करते हैं। ४७ (यत् मूत्रं करोति तस्मै स्वाहा) = शरीर में से मूत्र आदि के क्षार मलांश को दूर करनेवाले प्राण का हम आदर करते हैं । ४८. (कुर्वते स्वाहा) = शोधनकार्य को करते हुए का हम आदर करते हैं और ४९. (कृताय स्वाहा) = मलादि के शोधनकार्य को कर चुके प्राण के लिए हम शुभ शब्द बोलते हैं। इस प्रकार की प्रशंसा करते हुए उसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं।
Essence
भावार्थ- हमारे शरीरों में प्राण के ४९ भेद भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। उन्हीं से अङ्ग-प्रत्यङ्ग के सब कार्य चलते हैं । प्राणों की क्रिया से ही स्वास्थ्य व सुबुद्धि प्राप्त होती है, अतः विविध रूपों में उल्लिखित इन सब कार्यों को करते हुए प्राणों के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं।
Subject
उनन्चास मरुत