Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 32

34 Mantra
22/32
Devata- वाजादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वाजा॑य॒ स्वाहा॑ प्रस॒वाय॒ स्वाहा॑पि॒जाय॒ स्वाहा॑ क्रत॑वे॒ स्वाहा॒ स्वः] स्वाहा॑ मू॒र्ध्ने स्वाहा॑ व्यश्नु॒विने॒ स्वाहान्त्या॑य॒ स्वाहान्त्या॑य भौव॒नाय॒ स्वाहा॒ भुव॑नस्य॒ पत॑ये॒ स्वाहाधि॑पतये॒ स्वाहा॑ प्र॒जाप॑तये॒ स्वाहा॑॥३२॥

वाजा॑य। स्वाहा॑। प्र॒स॒वायेति॑ प्रऽस॒वाय॑। स्वाहा॑। अ॒पि॒जाय॑। स्वाहा॑। क्रत॑वे। स्वाहा॑। स्व᳕रिति॒ स्वः᳕। स्वाहा॑। मू॒र्ध्ने। स्वाहा॑। व्य॒श्नु॒विन॒ इति॑ विऽअश्नु॒विने॑। स्वाहा॑। आन्त्या॑य। स्वाहा॑। आन्त्या॑य। भौ॒व॒नाय॑। स्वाहा॑। भुव॑नस्य। पत॑ये। स्वाहा॑। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतये। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। स्वाहा॑ ॥३२ ॥

Mantra without Swara
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा स्वः स्वाहा मूर्ध्ने स्वाहा व्यश्नुविने स्वाहान्त्याय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा ॥

वाजाय। स्वाहा। प्रसवायेति प्रऽसवाय। स्वाहा। अपिजाय। स्वाहा। क्रतवे। स्वाहा। स्वरिति स्वः। स्वाहा। मूर्ध्ने। स्वाहा। व्यश्नुविन इति विऽअश्नुविने। स्वाहा। आन्त्याय। स्वाहा। आन्त्याय। भौवनाय। स्वाहा। भुवनस्य। पतये। स्वाहा। अधिपतय इत्यधिऽपतये। स्वाहा। प्रजापतय इति प्रजाऽपतये। स्वाहा॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (वाजाय स्वाहा) = [अन्नं वाज:- श० ५|१|१|१६] अन्न के लिए यज्ञक्रिया हो। [यज्ञाद् भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्नसम्भवः' गीता] यज्ञ से बादल होकर अन्न होता है, अतः इस अन्न की प्राप्ति के लिए हमारी यज्ञक्रिया ठीक से होती रहे। २. (प्रसवाय स्वाहा) = 'प्रसव' का शब्दार्थ अन्न व अन्न का होना ही है। उस प्रसव के लिए यज्ञक्रिया हो । ३. (अपिजाय स्वाहा) = दुबारा उत्पन्न होनेवाले [Born again] अन्नों के लिए यज्ञक्रिया हो अथवा [अप्सु जायते] जलों में होनेवाले अन्नों के लिए यज्ञ हो। ४. (क्रतवे स्वाहा) = शक्ति के लिए यज्ञ हो । उत्तम अन्नों से ही शक्ति प्राप्त होगी। ५. (स्वः स्वाहा) = सुख प्राप्ति के लिए व प्रकाश के लिए यज्ञ हो । सात्त्विक अन्नों के सेवन से बुद्धि शुद्ध होगी और प्रकाश की प्राप्ति होगी । ६. (मूर्ध्न स्वाहा) = मस्तिष्क के लिए यज्ञ हो । सात्त्विक अन्न बुद्धि को भी निर्मल करेगा। ७. (व्यश्नुविने स्वाहा) = शरीर में व्याप्त होनेवाले वीर्य के लिए यज्ञ हो। ८. (आन्त्याय भौवनाय स्वाहा) = सबसे अन्त में होनेवाले, सब प्राणियों के लिए हितकर ओज के लिए यज्ञ हो । शरीर में रस- रुधिरादि क्रम से वीर्य उत्पन्न होता है। उसका भी सार यह ओज है। यह सबसे अन्त में होनेवाला है। प्राणिमात्र के लिए यह हितकर है। ९. (भुवनस्य पतये स्वाहा) = भुवन के पति के लिए यज्ञ हो, अर्थात् सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले के लिए यज्ञ हो । यज्ञ होने की भावना होने पर ही कोई व्यक्ति सब प्राणियों का रक्षक बन सकता है। १०. (अधिपतये स्वाहा) = [मनो वै प्राणानामधिपतिः - श० १४।३।२।३] मन के लिए यज्ञ हो । वस्तुतः यज्ञिय भावना ही मन को स्वस्थ बनाती है। ११. (प्रजापतये स्वाहा) = प्रजापति के लिए यज्ञ हो। उस प्रभु को प्राप्त करने के लिए यह यज्ञ की भावना आवश्यक है। यज्ञिय भावना से हम भी प्रजापति का छोटारूप बन जाते हैं।
Essence
भावार्थ-यज्ञ से ही हमें वह सात्त्विक अन्न प्राप्त होता है जो हमारी शक्ति के वर्धन के साथ हमारी बुद्धि का भी वर्धक होता है। यह अन्न हमें सौम्य वीर्य को प्राप्त कराकर जितेन्द्रिय व लोकहित के कर्मों में लगनेवाला बनाता है।
Subject
सात्त्विक अन्न व सात्त्विक बुद्धि