Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 30

34 Mantra
22/30
Devata- वस्वादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- कृतिः Swara- निषादः
Mantra with Swara
अस॑वे॒ स्वाहा॒ वस॑वे॒ स्वाहा॑ वि॒भुवे॒ स्वाहा॒ विव॑स्वते॒ स्वाहा॑ गण॒श्रिये॒ स्वाहा॑ ग॒णप॑तये॒ स्वाहा॑भि॒भुवे॒ स्वाहाधि॑पतये॒ स्वाहा॑ शू॒षाय॒ स्वाहा॑ सꣳस॒र्पाय॒ स्वाहा॑ च॒न्द्राय॒ स्वाहा॒ ज्योति॑षे॒ स्वाहा॑ मलिम्लु॒चाय॒ स्वाहा॒ दिवा॑ प॒तये॒ स्वाहा॑॥३०॥

अस॑वे। स्वाहा॑। वस॑वे। स्वाहा॑। वि॒भुव॒ इति॑ वि॒ऽभुवे॑। स्वाहा॑। विव॑स्वते। स्वाहा॑। ग॒ण॒श्रिय॒ इति॑ गण॒ऽश्रिये॑। स्वाहा॑। ग॒णप॑तय॒ इति॑ ग॒णऽप॑तये। स्वाहा॑। अ॒भि॒भुव॒ इत्य॑भि॒ऽभुवे॑। स्वाहा॑। अधि॑पतय॒ इ॒त्यधि॑ऽपतये। स्वाहा॑। शू॒षाय॑। स्वाहा॑। स॒ꣳस॒र्पायेति॑ सम्ऽस॒र्पाय॑। स्वाहा॑। च॒न्द्राय॑। स्वाहा॑। ज्योति॑षे। स्वाहा॑। म॒लि॒म्लु॒चाय॑। स्वाहा॑। दिवा॑। प॒तये॑। स्वाहा॑ ॥३० ॥

Mantra without Swara
असवे स्वाहा वसवे स्वाहा विभुवे स्वाहा विवस्वते स्वाहा गणश्रिये स्वाहा गणपतये स्वाहाभिभुवे स्वाहाधिपतये स्वाहा शूषाय स्वाहा सँसर्पाय स्वाहा चन्द्राय स्वाहा ज्योतिषे स्वाहा मलिम्लुचाय स्वाहा दिवा पतयते स्वाहा ॥

असवे। स्वाहा। वसवे। स्वाहा। विभुव इति विऽभुवे। स्वाहा। विवस्वते। स्वाहा। गणश्रिय इति गणऽश्रिये। स्वाहा। गणपतय इति गणऽपतये। स्वाहा। अभिभुव इत्यभिऽभुवे। स्वाहा। अधिपतय इत्यधिऽपतये। स्वाहा। शूषाय। स्वाहा। सꣳसर्पायेति सम्ऽसर्पाय। स्वाहा। चन्द्राय। स्वाहा। ज्योतिषे। स्वाहा। मलिम्लुचाय। स्वाहा। दिवा। पतये। स्वाहा॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (असवे स्वाहा) = प्राणों के लिए यज्ञक्रिया हो। २. (वसवे स्वाहा) = शरीर में वास करनेवाले वासकतत्त्वों के लिए यज्ञ हो । ३. (विभुवे स्वाहा) = व्यापक वायुतत्त्व के लिए यज्ञ हो । ४. (विवस्वते स्वाहा) = किरणों के द्वारा पालन करनेवाले सूर्य के लिए यज्ञ हो । ५. (गणश्रिये स्वाहा) = शरीर में जो 'ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण' आदि के गण हैं अथवा 'वसु, रुद्र, आदित्य व मरुत्' आदि देवों के गण हैं, उनकी शोभा के लिए यज्ञ हो । ६. (गणपतये) = शरीर में होनेवाले इन सब गणों के पति के लिए यज्ञ हो। ७. (अभिभुवे स्वाहा) = सब शत्रुओं के पराजय करनेवाले के लिए यज्ञक्रिया हो। ८. (अधिपतये) = सब इन्द्रियादि का स्वामी बननेवाले के लिए यज्ञ हो । ९. (शूषाय) = शत्रुओं के शोषक बल के लिए (स्वाहा) = यज्ञ हो । १०. (संसर्पाय स्वाहा) = संसर्पण के लिए, जीवन के अन्त तक ठीक गति चलती रहे, इसके लिए यज्ञ हो । ११. (चन्द्राय) = अह्लादमयता के लिए यज्ञ हो। १२. (ज्योतिषे) = अन्त: प्रकाश के लिए यज्ञ हो । १३. (मलिम्लुचाय स्वाहा) = चोर के लिए यज्ञ हो, स्वार्थ को छोड़ने की क्रिया हो । उदाहरणार्थ एक चोर चोरी का दण्ड भोगकर घर लौटता है। उसे यदि समाज कुछ स्वार्थत्याग करके जीवन में स्थापित करने का प्रयत्न करती है तो वह फिर चोर नहीं रह जाता। १४. (दिवा पतयते स्वाहा) = दिन के पति के लिए यज्ञक्रिया हो । 'हम दिन के अधिपति बने रहें। दिन हमारा अधिपति न बन जाए', इसके लिए हम सदा यज्ञादि उत्तम क्रियाओं में लगे रहें।
Essence
भावार्थ-यज्ञों से हम अपने जीवन को अत्युत्तम बना पाएँ ।
Subject
शरीर की उत्तमता