Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 24

34 Mantra
22/24
Devata- दिशो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्राच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॒ दक्षि॑णायै दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॑ प्र॒तीच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहोदी॑च्यै दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहो॒र्ध्वायै॑ दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहाऽवा॑च्यै दि॒शे स्वाहा॒ऽर्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॑॥२४॥

प्राच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। दक्षि॑णायै। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। प्र॒तीच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। उदी॑च्यै। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। ऊ॒र्ध्वायै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑। अवा॑च्यै। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑ ॥२४ ॥

Mantra without Swara
प्राच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा दक्षिणायै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा प्रतीच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहोदीच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहोर्ध्वायै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहावाच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा ॥

प्राच्यै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा। दक्षिणायै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा। प्रतीच्यै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा। उदीच्यै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा। ऊर्ध्वायै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा। अवाच्यै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा॥२४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की भावना को ही विस्तार से इस अध्याय की समाप्ति तक कहेंगे। जब मनुष्य की वृत्ति यज्ञिय व स्वार्थ से ऊपर उठी हुई होती है तब उसके लिए सारा संसार सुन्दर हो जाता है। अपनी वृत्ति खराब होने पर संसार भी उसके लिए खराब हो जाता है, अतः कहते हैं कि (प्राच्यै दिशे स्वाहा) = पूर्व दिशा के लिए यज्ञशील बन। 'यह दिशा तेरे लिए सुन्दर हो' इसके लिए तू स्वार्थ से ऊपर उठ । (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = पूर्व दिशा की उपदिशा के लिए भी तू यज्ञशील बन । २. इसी प्रकार (दक्षिणायै दिशे स्वाहा) = दक्षिण दिशा के सौन्दर्य के लिए तू यज्ञ करनेवाला बन। (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = इस दक्षिण की उपदिशा के लिए भी यज्ञशील बन। ३. (प्रतीच्यै दिशे स्वाहा) = पश्चिम दिशा के लिए तू यज्ञिय हो और (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = पश्चिम की उपदिशा के लिए यज्ञ करनेवाला बन। ४. (उदीच्यै दिशे स्वाहा) = उत्तर दिशा के सौन्दर्य के लिए तू यज्ञशील हो और (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = उत्तर की उपदिशा के लिए यज्ञ करनेवाला बन। ५. (ऊर्ध्वायै दिशे स्वाहा) = ऊर्ध्व दिशा के लिए तू यज्ञशील हो और (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = ऊर्ध्व की उपदिशा के लिए यज्ञ करनेवाला बन। ६. (दिशे स्वाहा) = नीचे की दिशा के लिए तू यज्ञशील हो और (अर्वाच्यै दिशे स्वाहा) = नीचे की उपदिशा के लिए तू यज्ञशील हो ।
Essence
भावार्थ - यज्ञिय व निःस्वार्थ वृत्ति के द्वारा हमारा यह संसार आगे-पीछे, दायें-बायें व ऊपर-नीचे सब ओर से सुन्दर - ही सुन्दर हो जाता है। आसुरवृत्ति ने ही संसार को मलिन किया हुआ है।
Subject
विश्व का सौन्दर्य