Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 20

34 Mantra
22/20
Devata- प्रजापत्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- आद्यस्य भुरिग्धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
काय॒ स्वाहा॒ कस्मै॒ स्वाहा॑ कत॒मस्मै॒ स्वाहा॒ स्वाहा॒धिमाधी॑ताय॒ स्वाहा॒ मनः॑ प्र॒जाप॑तये॒ स्वाहा॑ चि॒त्तं विज्ञा॑ता॒यादि॑त्यै॒ स्वाहादि॑त्यै म॒ह्यै स्वाहादि॑त्यै सुमृडी॒कायै॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै पाव॒कायै॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै बृह॒त्यै स्वाहा॑ पू॒ष्णे स्वाहा॑ पू॒ष्णे प्र॑प॒थ्याय॒ स्वाहा॑ पू॒ष्णे न॒रन्धि॑षाय॒ स्वाहा॒ त्वष्ट्रे॒ स्वाहा॒ त्वष्ट्रे॑ तु॒रीपा॑य॒ स्वाहा॒ त्वष्ट्रे॑ पुरु॒रूपा॑य॒ स्वाहा॒ विष्ण॑वे॒ स्वाहा॒ विष्ण॑वे निभूय॒पाय॒ स्वाहा॒ विष्ण॑वे शिपिवि॒ष्टाय॒ स्वाहा॑॥२०॥

काय॑। स्वाहा॑। कस्मै॑। स्वाहा॑। क॒त॒मस्मै॑। स्वाहा॑। स्वाहा॑। आ॒धिमित्या॒ऽधिम्। आधी॑ता॒येत्याऽधी॑ताय। स्वाहा॑। मनः॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। स्वाहा॑। चि॒त्तम्। विज्ञा॑ता॒येति॑ विऽज्ञा॑ताय। अदि॑त्यै। स्वाहा॑। अदि॑त्यै। म॒ह्यै। स्वाहा॑। अदि॑त्यै। सु॒मृ॒डी॒काया॒ इति॑ सुऽमृडी॒कायै॑। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। पा॒व॒कायै॑। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। बृ॒ह॒त्यै। स्वाहा॑। पू॒ष्णे। स्वाहा॑। पू॒ष्णे। प्र॒प॒थ्या᳖येति॑ प्रऽपथ्या᳖य। स्वाहा॑। पू॒ष्णे। न॒रन्धि॑षाय। स्वाहा॑। त्वष्ट्रे॑। स्वाहा॒। त्वष्ट्रे॑। तु॒रीपा॑य। स्वाहा॑। त्वष्ट्रे॑। पु॒रु॒रूपा॒येति॑ पुरु॒ऽरूपा॑य स्वाहा॑। विष्ण॑वे। स्वाहा॑। विष्ण॑वे। नि॒भू॒य॒पायेति॑ निभूय॒ऽपाय॑। स्वाहा॑। विष्ण॑वे। शि॒पि॒वि॒ष्टायेति॑ शिपि॒ऽवि॒ष्टाय॑। स्वाहा॑ ॥२० ॥

Mantra without Swara
काय स्वाहा कस्मै स्वाहा कतमस्मै स्वाहा स्वाहाधिमाधीताय स्वाहा मनः प्रजापतये स्वाहाचित्तँविज्ञातायादित्यै स्वाहादित्यै मह्यै स्वाहादित्यै सुमृडीकायै स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा पूष्णे प्रपथ्याय स्वाहा पूष्णे नरन्धिषाय स्वाहा त्वष्ट्रे स्वाहा त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा विष्णवे स्वाहा विष्णवे निभूयपाय स्वाहा विष्णवे शिपिविष्टाय स्वाहा ॥

काय। स्वाहा। कस्मै। स्वाहा। कतमस्मै। स्वाहा। स्वाहा। आधिमित्याऽधिम्। आधीतायेत्याऽधीताय। स्वाहा। मनः। प्रजापतय इति प्रजाऽपतये। स्वाहा। चित्तम्। विज्ञातायेति विऽज्ञाताय। अदित्यै। स्वाहा। अदित्यै। मह्यै। स्वाहा। अदित्यै। सुमृडीकाया इति सुऽमृडीकायै। स्वाहा। सरस्वत्यै। स्वाहा। सरस्वत्यै। पावकायै। स्वाहा। सरस्वत्यै। बृहत्यै। स्वाहा। पूष्णे। स्वाहा। पूष्णे। प्रपथ्यायेति प्रऽपथ्याय। स्वाहा। पूष्णे। नरन्धिषाय। स्वाहा। त्वष्ट्रे। स्वाहा। त्वष्ट्रे। तुरीपाय। स्वाहा। त्वष्ट्रे। पुरुरूपायेति पुरुऽरूपाय स्वाहा। विष्णवे। स्वाहा। विष्णवे। निभूयपायेति निभूयऽपाय। स्वाहा। विष्णवे। शिपिविष्टायेति शिपिऽविष्टाय। स्वाहा॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (काय) = 'को हि प्रजापतिः' [श० ६।२।२।५] प्रजापति के लिए (स्वाहा) = तू अपने को अर्पित करनेवाला बन। (कस्मै स्वाहा) = आनन्दस्वरूप परमात्मा के लिए तू अपने को अर्पित करनेवाला बन। (कतमस्मै स्वाहा) = अत्यन्त आनन्दस्वरूप परमात्मा के लिए तू अपने को अर्पित करनेवाला बन । २. (आधिम्) = [Reflection=धर्मचिन्ता = अध्यात्म-विचार] अपने सारे विचार को (आधीताय) = स्वरूपचिन्तन के लिए अथवा इस संसार के तत्त्वचिन्तन के लिए (स्वाहा) = अर्पित कर, अर्थात् तू सदा पुरुष व प्रकृति का स्वरूपचिन्तन करनेवाला बन। (मनः) = अपने मन को (प्रजापतये स्वाहा) = प्रजापति के लिए अर्पित कर । (चित्तम्) = अपने चित्त को (विज्ञाताय) = विज्ञान की प्राप्ति के लिए (स्वाहा) = अर्पित कर । ३. (अदित्यै) = अखण्डन के लिए तू (स्वाहा) = स्वार्थ को त्यागनेवाला बन । स्वार्थत्याग से ही तुझे पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होगा । इस (अदित्यै) = अदीना देवमाता [नि० ५।२२] के लिए जोकि मौ- महनीय है, तेरे जीवन को महत्त्वपूर्ण बनाएगी, उसके लिए (स्वाहा) = तू स्वार्थत्याग करनेवाला बन । स्वार्थ मनुष्य को दीन बनाता है, स्वार्थ से ऊपर उठकर हम दिव्य गुणों को प्राप्त करते हैं। इस (अदित्यै) = वेदवाणी के लिए [नि०१।४] तू (स्वाहा) = अपने को अर्पित कर जो (सुमृडीकायै) = तेरे जीवन को बड़ा सुखी बनाएगी । ४. (सरस्वत्यै) = ज्ञानाधिदेवता की आराधना के लिए (स्वाहा) = तू अपने को अर्पित कर । (सरस्वत्यै) = उस ज्ञानाधिदेवता के लिए तू अपने को (स्वाहा) = अर्पित कर जो (पावकायै) = पवित्र करनेवाली है। उस (सरस्वत्यै) = ज्ञानाधिदेवता के लिए तू (स्वाहा) = स्वार्थत्याग कर जो (बृहत्यै) = तेरे वर्धन का कारण होगी। ५. (पूष्णे) = पोषण की देवता के लिए तू (स्वाहा) = स्वार्थ का त्याग कर। स्वार्थत्याग शरीर के उत्तम पोषण का कारण बनता है। (पूष्णे स्वाहा) = उस पोषण के लिए तू निःस्वार्थ हो जो (प्रपथ्याय) = उत्कृष्ट मार्ग पर चलने के लिए सहायक होता है। (पूष्णे स्वाहा) = उस पोषण के लिए तू स्वार्थ से ऊपर उठ जो (नरन्धिषाय) = [ नरान् दधाति धारयति - उ० ] मनुष्यों का धारण करता है। स्वार्थ से ऊपर उठकर ही मनुष्य लोकहित कर सकता है और यह लोकहित ही [नरान् दिधेष्टि शब्दयति उदयेन - म० ] मनुष्य के चतुर्दिक् प्रवाही यश का कारण बनता है । ६. अब ज्ञान व पुष्ट शरीर को प्राप्त करके (त्वष्ट्रे स्वाहा) = निर्माण की देवता के लिए तू अपने को अर्पित कर, अर्थात् निर्माण के कार्यों में लग जा। उस (त्वष्ट्रे स्वाहा) = निर्माण की देवता के लिए तू अपने को अर्पित कर जो (तुरीपाय) = [ तूर्णं धारया पाति - उ० ] शीघ्रता से रक्षा करनेवाला है। (त्वष्ट्रे) = उस निर्माण की देवता के लिए (स्वाहा) = तू अपने को अर्पित कर जो (पुरुरूपाय) = [ पुरुणि रूपाणि यस्य] बड़े उत्तम रूपों को प्राप्त करानेवाली है। यदि राष्ट्र में सब व्यक्ति निर्माण के कार्यों में लग जाएँ तो जहाँ राष्ट्र का शीघ्र ही कल्याण हो जाएगा वहाँ राष्ट्र को बड़ा सुन्दर रूप प्राप्त होगा। देश की आकृति ही बदल जाएगी। सब जगह 'सुख, सौन्दर्य व शान्ति' का राज्य हो सकेगा। ७. (विष्णवे स्वाहा) = [ विष्लृ व्याप्तौ] व्यापक मनोवृत्ति के लिए तू स्वार्थत्याग कर । व्यापकता को तभी प्राप्त होंगे जब स्वार्थ को समाप्त करेंगे। उस (विष्णवे) व्यापक, उदार मनोवृत्ति के लिए (स्वाहा) = तू स्वार्थत्याग कर जो (निभूयपाय) = [नीचैर्भूत्वा यः पाति - उ०] नम्र बनकर सबका रक्षण करती है। उदार वृत्तिवाला पुरुष रक्षणादि कार्यों में प्रवृत्त होता है, परन्तु इन कार्यों को करते हुए सदा नम्र बना रहता है। उस (विष्णवे स्वाहा) = उदार मनोवृत्ति के लिए निःस्वार्थ बन जो (शिपिविष्टाय) = [शिपिषु अक्रोशत्सु प्राणिषु प्रविष्टाय - द० ] उन-उन क्लेशों से पीड़ित व क्रन्दन करते हुए प्राणियों में प्रवेश करता है तथा अज्ञानवश उनसे किये गये आक्रोशों का ध्यान न करते हुए उनके हित में लगा रहता है। ये 'विष्णु' वृत्तिवाले लोग 'तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानाम्' लोगों से दी गई गालियों को सदा सहते हैं।
Essence
भावार्थ-हम उस प्रभु के लिए अपना अर्पण करें जो आनन्दस्वरूप है। स्वरूप के स्मरण के लिए हमारा चिन्तन हो, मन प्रजापति में लगा हो, ज्ञान की रुचि हो, अदीना देवमाता, सरस्वती, पूषा, त्वष्टा व विष्णु के हम आराधक बनें।
Subject
समर्पण व स्वार्थत्याग