Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 2

34 Mantra
22/2
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒माम॑गृभ्णन् रश॒नामृ॒तस्य॒ पूर्व॒ऽआयु॑षि वि॒दथे॑षु क॒व्या। सा नो॑ऽअ॒स्मिन्त्सु॒तऽआब॑भूवऽऋ॒तस्य॒ साम॑न्त्स॒रमा॒रप॑न्ती॥२॥

इ॒माम्। अ॒गृ॒भ्ण॒न्। र॒श॒नाम्। ऋ॒तस्य॑। पूर्वे॑। आयु॑षि। वि॒दथे॑षु। क॒व्या। सा। नः॒। अ॒स्मिन्। सु॒ते। आ। ब॒भू॒व॒। ऋ॒तस्य॑। साम॑न्। स॒रम्। आ॒रप॒न्तीत्या॒ऽरप॑न्ती ॥२ ॥

Mantra without Swara
इमामगृभ्णन्रशनामृतस्य पूर्व आयुषि विदथेषु कव्या । सा नोऽअस्मिन्त्सुत आऽबभूवऽऋतस्य सामन्त्सरमारपन्ती ॥

इमाम्। अगृभ्णन्। रशनाम्। ऋतस्य। पूर्वे। आयुषि। विदथेषु। कव्या। सा। नः। अस्मिन्। सुते। आ। बभूव। ऋतस्य। सामन्। सरम्। आरपन्तीत्याऽरपन्ती॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार 'तेजस्वी, वीर्यवान् व दीर्घजीवी' बनने के लिए (कव्या) = [कवयः] समझदार लोग, वस्तुओं के तत्त्व को समझनेवाले लोग, (पूर्वे आयुषि) = पहले ही जीवन में (विदथेषु) = ज्ञानयज्ञों के प्रसंगों में (इमाम्) = इस ऋतस्य रशनाम् ऋत की रशना को, व्यवस्थित जीवन के दृढ़निश्चय को (अगृभ्णन्) = स्वीकार करते हैं। प्रत्येक बात का ठीक समय व ' ठीक स्थान पर होना 'ऋत' कहलाता है। 'रशना' शब्द मेखला का वाचक होता हुआ दृढ़निश्चय का प्रतीक है। आचार्य लोग विद्यार्थी को मेखला देते थे, उसे ज्ञानी बनने के लिए कमर कस लेने व दृढनिश्चयी बनने का उपदेश देते थे। यह सब 'पूर्व आयुषि' पहले जीवन में, जीवन के पहले प्रयाण में ही कर लेना ठीक है। ऐसा कर लेने पर ही यात्रा ठीक आरम्भ हो जाती है। आचार्य लोग विद्यार्थी को ज्ञान देते थे और उसे ऋत के मार्ग पर चलने की दृढ़ प्रेरणा प्राप्त करा देते थे । २. (सा) = वह 'ऋत की रशना' (नः) = हमें (अस्मिन् सुते) = इस जीवन-यज्ञ में (या) = इस उत्पन्न हुए हुए जगत् में आबभूव = सदा व्याप्त किये रक्खे, अर्थात् हम अपने इस जीवन में इस 'ऋत की रशना' को कभी उतार न दें, हमारा ऋत के मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय सदा बना रहे। ३. हमारे लिए यह मेखला (ऋतस्य सामन्) = ऋत की उपासना में [सामवेद-उपासनावेद ] (सरम्) = कर्तव्यमार्ग का आरपन्ती उपदेश देती है। हम सदा इस ऋत के उपासक बने रहें। 'सब कार्य ठीक समय व ठीक स्थान पर करनेवाले बनना' ही ऋत का उपासन है। ऋत का उपासक अपने कर्त्तव्यमार्ग को स्पष्ट देखता है और उसका आचरण करता है, इसका सारा जीवन ही यज्ञमय-सा हो जाता है अतः इसका नाम ही 'यज्ञपुरुष' हो जाता है। ऋत ही यज्ञ है। ऋत की रशना का ग्रहण करनेवाला यह 'यज्ञपुरुष' है।
Essence
भावार्थ- हम जीवन के जीवनयज्ञ में धारण किये रक्खें। प्रारम्भ में ही ऋत की रशना का धारण करें। इसे इस यह मेखला हमें सदा कर्त्तव्यमार्ग का उपदेश देनेवाली हो।
Subject
ऋत की रशना