Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 16

34 Mantra
22/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स ह॑व्य॒वाडम॑र्त्यऽउ॒शिग्दू॒तश्चनो॑हितः।अ॒ग्निर्धि॒या समृ॑ण्वति॥१६॥

सः। ह॒व्य॒वाडिति॑ हव्य॒ऽवाट्। अम॑र्त्यः। उ॒शिक्। दू॒तः। चनो॑हित॒ इति चनः॑ऽहितः। अ॒ग्निः। धि॒या। सम्। ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
स हव्यवाडमर्त्यऽउशिग्दूतश्चनोहितः । अग्निर्धिया समृण्वति ॥

सः। हव्यवाडिति हव्यऽवाट्। अमर्त्यः। उशिक्। दूतः। चनोहित इति चनःऽहितः। अग्निः। धिया। सम्। ऋण्वति॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सः) = वह (अग्नि:) = अग्रेणी - सब उन्नतियों का साधक (धिया) = बुद्धिपूर्वक कर्मों से (समृण्वति) = प्राप्त होता है। प्रभु प्राप्ति के लिए एकमात्र उपाय 'बुद्धिपूर्वक कर्म करना' है। अकर्मण्य को प्रभु की प्राप्ति नहीं होती, अतः मनुष्य को कर्मशील तो बनना ही है। वे कर्म उसे बुद्धिपूर्वक करने हैं। 'मनुष्य' का अर्थ 'मत्वा कर्माणि सीव्यति' है-विचारकर कर्मों को करता है। २. वे प्रभु (हव्यवाट्) = हव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले हैं। हमें उत्तम यज्ञिय पदार्थों को प्राप्त कराके इन पदार्थों के सेवन से वे हमें शुद्ध बुद्धिवाला बनाते हैं । ३. (अमर्त्य) = वे प्रभु अमर्त्य हैं, उनके उपासन से हम भी अमर्त्य बनते हैं, ४. (उशिक्) = मेधावी हैं अथवा जीव का हित चाहनेवाले हैं । ५. (दूतः) = उसका हित करने के लिए वे उसे तपस्या की अग्नि में सन्तप्त करते हैं। तप की अग्नि में सन्तप्त होकर ही तो हम शुद्ध जीवनवाले बनेंगे। इन तपों को सामान्य लोग कष्ट समझते हैं और वे धर्मात्माओं को दुःखपतित समझ विचित्र - सी धारणाएँ बना लेते हैं। ६. वे प्रभु (चनोहितः) = [धनसा हितः] अन्न द्वारा हममें निहित होते हैं। अन्न की शुद्धि होने पर अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण के शुद्ध होने पर वहाँ प्रभु का निवास होता है।
Essence
भावार्थ- हम उस प्रभु को प्रज्ञापूर्वक कर्मों द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करें जो प्रभु हमें हव्य पदार्थ प्राप्त कराते हैं, अमर्त्य बनाते हैं, हमारे भले की ही कामना करते हैं, तप की अग्नि में हमें तपाते हैं तथा सात्त्विक अन्न के सेवन से हमारे हृदयों में निहित होते हैं ।
Subject
प्रज्ञापूर्वक कर्मों से प्रभु-प्राप्ति