Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 52

61 Mantra
21/52
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वीऽऊ॒र्जा॑हुती॒ दुघे॑ सु॒दुघेन्द्रे॒ सर॑स्वत्य॒श्विना॑ भि॒षजा॑वतः। शु॒क्रं न ज्योति॒ स्तन॑यो॒राहु॑ती धत्तऽइन्द्रि॒यं व॑सु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य व्यन्तु॒ यज॑॥५२॥

दे॒वी इति॑ दे॒वी। ऊ॒र्ज्जाहु॑ती॒ इत्यू॒र्जाऽआहु॑ती। दुघे॒ इति॒ दुघे॑। सु॒दुघेति॑ सु॒ऽदुघा। इन्द्रे॑। सर॑स्वती। अ॒श्विना॑। भि॒षजा॑। अ॒व॒तः॒। शु॒क्रम्। न। ज्योतिः॑। स्तन॑योः। आहु॑ती॒ इत्याऽहु॑ती। ध॒त्त॒। इ॒न्द्रि॒यम्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। व्य॒न्तु॒। यज॑ ॥५२ ॥

Mantra without Swara
देवीऽऊर्जाहुती दुघे सुदुघेन्द्रे सरस्वत्यश्विना भिषजावतः । शुक्रन्न ज्योति स्तनयोराहुती धत्तऽइन्द्रियमवसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥

देवी इति देवी। ऊर्ज्जाहुती इत्यूर्जाऽआहुती। दुघे इति दुघे। सुदुघेति सुऽदुघा। इन्द्रे। सरस्वती। अश्विना। भिषजा। अवतः। शुक्रम्। न। ज्योतिः। स्तनयोः। आहुती इत्याऽहुती। धत्त। इन्द्रियम्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। व्यन्तु। यज॥५२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. देवी (ऊर्जाहुती) = [देवी ऊर्जाहुती द्यावापृथिव्यौ - नि० ९।४२] दिव्य गुणोंवाले बल व प्राणशक्ति के वर्धक अन्न देनेवाले ये द्युलोक व पृथिवीलोक (दुघे) = हमारे मनोरथों का पूरण करनेवाले हैं, वस्तुतः ये द्युलोक व पृथिवीलोक हमारे पिता व माता के तुल्य हैं [द्यौष्पिता, पृथिवी माता]। माता-पिता सन्तान का पूरण करते हैं, ठीक इसी प्रकार ये द्युलोक व पृथिवीलोक हमारा पूरण करते हैं। २. (इन्द्रे) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता पुरुष में (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता (सुदुघा) = बहुत उत्तमता से पूरण करनेवाली होती है। ज्ञान सब दोषों को दूर करके सचमुच हमारा सुन्दर पूरण करता है। ३. (अश्विना) = ये प्राणापान (भिषजा) = सब रोगों का प्रतीकार करते हैं, नासिका में दायाँ स्वर सूर्यस्वर है, यह शरीर में प्राणशक्ति को भरता है और बायाँ स्वर चन्द्रस्वर है यह अपान को ठीक रखता है, अतः शरीर में ये प्राणापान सूर्य और चन्द्रमा' हैं। दोनों का समन्वय होने पर किसी प्रकार का रोग नहीं होता। केवल सूर्यस्वर होता तो उष्णता व अम्लता बढ़कर शरीर समाप्त हो जाता तथा केवल चन्द्रस्वर होने पर कोढ़ के रोग बढ़कर शरीर क्षयी हो जाता। इसी दृष्टिकोण से 'अश्विना' सदा द्विवचन में आता है। ये दोनों मिलकर ही 'भिषजा' है। ये रोगों का प्रतीकार करनेवाले प्राणापान अवतः रक्षा करते हैं। मनुष्य को रोगों का शिकार नहीं होने देते। ४. जब द्युलोक व पृथिवीलोक हमारा उत्तम अन्नों से पूरण करनेवाले होते हैं, तब ज्ञान हमारी कमियों को दूर करके हमारा उत्तम पूरण करनेवाला होता है। जब ये प्राणापान भिषक् बनकर हमारी रक्षा करते हैं उस समय ये आहुती = [ऊर्जाहुती] द्यावापृथिवी (स्तनयो:) = माता बननेवाली युवती के स्तनों में (शुक्रम्) = वीर्यसम्पन्न (न) = तथा (ज्योतिः) = ज्ञान के प्रकाश से युक्त दुग्ध को (धत्त) = स्थापित करते हैं। इस माता के स्तनों का दूध सन्तान को वीर्यसम्पन्न व ज्ञानसम्पन्न बनाता है । ५. ये (आहुती) = [ऊर्जाहुती] द्यावापृथिवी (इन्द्रियं धत्त) = प्रत्येक इन्द्रिय के बल का स्थापन करते हैं । ६. (वसुवने) = निवासक तत्त्वों को प्राप्त करने के लिए (वसुधेयस्य) = वीर्य का (व्यन्तु) = पान करें। शरीर में व्याप्त होकर यह वीर्य ही अङ्ग-प्रत्यङ्ग को सशक्त करता है। ७. ऐसा हो सके इसके लिए प्रभु कहते हैं कि हे पुरुष ! तू (यज) = यज्ञशील बन ।
Essence
भावार्थ- द्यावापृथिवी दिव्य अन्नों से हमारा पूरण करते हैं। ज्ञान दोषों को दूर करके हमारा उत्तम पूरण करता है। प्राणापान हमारे वैद्य हैं और रोगों से हमारा रक्षण करते हैं। ऐसा होने पर माता के स्तनों में शक्ति व ज्ञानसम्पन्न दूध होता है। ये द्यावापृथिवी हमारी सब इन्द्रियों को सशक्त बनाते हैं। हम वीर्य की रक्षा करें और उसके लिए यज्ञशील बन भोगवृत्ति से ऊपर उठें।
Subject
स्तनों में शुक्र और ज्योति