Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 50

61 Mantra
21/50
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वीऽउ॒षासा॑व॒श्विना॑ सु॒त्रामेन्द्रे॒ सर॑स्वती।बलं॒ न वाच॑मा॒स्यऽउ॒षाभ्यां॑ दधुरिन्द्रि॒यं व॑सु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य व्यन्तु॒ यज॑॥५०॥

दे॒वीऽइति॑ दे॒वी। उ॒षासौ॑। उषसा॒वित्यु॒षसौ॑। अ॒श्विना॑। सु॒त्रामेति॑ सु॒ऽत्रामा॑। इन्द्रे॑। सर॑स्वती। बल॑म्। न। वाच॑म्। आ॒स्ये᳖। उ॒षाभ्या॑म्। द॒धुः॒। इ॒न्द्रि॒यम्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। व्य॒न्तु॒। यज॑ ॥५० ॥

Mantra without Swara
देवीऽउषासावश्विना सुत्रामेन्द्रे सरस्वती । बलन्न वाचमास्य उषाभ्यान्दधुरिन्द्रियँवसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥

देवीऽइति देवी। उषासौ। उषसावित्युषसौ। अश्विना। सुत्रामेति सुऽत्रामा। इन्द्रे। सरस्वती। बलम्। न। वाचम्। आस्ये। उषाभ्याम्। दधुः। इन्द्रियम्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। व्यन्तु। यज॥५०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (देवी) = दिव्य गुणों से युक्त व देदीप्यमान (उषासौ) = [सायं प्रातः संधिवेले- द०] सायं व प्रात: के सन्धिकाल तथा (सुत्रामा) = उत्तमता से त्राण व रक्षण करनेवाले (अश्विना) = प्राणापान तथा (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता (इन्द्रे) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता पुरुष के (आस्ये) = मुख में (बलम्) = बल को (न) = और (वाचम्) = वाणी की शक्ति को धारण करते हैं। २. ये प्राणापान तथा ज्ञान (उषाभ्याम्) = इन सन्धिवेलाओं के साथ इसमें (इन्द्रियम्) = सब इन्द्रियों के बल को (दधुः) = धारण करते हैं। प्रातः - सायं वाणी उद्गीथ का गायन करती है और यह गायन उसे बल प्राप्त कराता है। ३. (वसुवने) = निवासक तत्त्वों को प्राप्त करने के लिए (वसुधेयस्य) = वीर्य का (व्यन्तु) = पान करें, अर्थात् उसे शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें। ४. इसी दृष्टिकोण से प्रभु कहते हैं कि यज हे मनुष्य! तू यज्ञशील बन।
Essence
भावार्थ- प्रात:- सायं उद्गीथ का गायन करनेवाली वाणी प्राणापान की साधना से तथा ज्ञान की आराधना से सबल बनती है।
Subject
मुख में वाक्शक्ति