Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 49

61 Mantra
21/49
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- ब्राह्म्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
दे॒वीर्द्वारो॑ऽअ॒श्विना॑ भि॒षजेन्द्रे॒ सर॑स्वती।प्रा॒णं न वी॒र्य्यं न॒सि द्वारो॑ दधुरिन्द्रि॒यं व॑सु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य व्यन्तु॒ यज॑॥४९॥

दे॒वीः। द्वारः॑। अ॒श्विना॑। भि॒षजा॑। इन्द्रे॑। सर॑स्वती। प्रा॒णम्। न। वी॒र्य्य᳖म्। न॒सि। द्वारः॑। द॒धुः॒। इ॒न्द्रि॒यम्। व॒सु॒वन इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒धेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। व्य॒न्तु॒। यज॑ ॥४९ ॥

Mantra without Swara
देवीर्द्वारोऽअश्विना भिषजेन्द्रे सरस्वती । प्राणन्न वीर्यन्नसि द्वारो दधुरिन्द्रियँवसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥

देवीः। द्वारः। अश्विना। भिषजा। इन्द्रे। सरस्वती। प्राणम्। न। वीर्य्यम्। नसि। द्वारः। दधुः। इन्द्रियम्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुधेयस्येति वसुऽधेयस्य। व्यन्तु। यज॥४९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (भिषजा अश्विना) = सब रोगों का प्रतीकार करनेवाले वैद्यभूत प्राणापान तथा सरस्वती ज्ञानाधिदेवता (देवीः द्वार:) = दिव्य द्वारों को (दधुः) = स्थापित करते हैं, अर्थात् प्राणापान की साधना तथा ज्ञान की आराधना करने पर 'मुख, पायु तथा उपस्थ व ब्रह्मरन्ध्र' आदि सब द्वार ठीक से अपना-अपना कार्य करनेवाले होते हैं । २. ये (अश्विना) = प्राणापान तथा (सरस्वती) = ज्ञान (नसि) = घ्राणेन्द्रिय में (प्राणम्) = घ्राणशक्ति को तथा (वीर्यम्) = तेजस्विता को स्थापित करते हैं । ३. नासिका में घ्राणशक्ति व वीर्य की स्थापना के साथ ये प्राणापान व ज्ञान (द्वार:) = सब द्वारों को तथा (इन्द्रियम्) = उन इन्द्रियद्वारों में उस-उस शक्ति को (दधुः) = धारण करते हैं। ४. (वसुवने) = [वसुवननाय] निवासक तत्त्वों की प्राप्ति के लिए (वसुधेयस्य) = वीर्य का (व्यन्तु) पान करें, इसे शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें। ५. प्रभु कहते हैं कि इस सबके लिए तू (यज) = यज्ञशील बन, तेरी वृत्ति भोगप्रवण न हो।
Essence
भावार्थ- प्राणापान की साधना तथा ज्ञान की आराधना से हमारे सब इन्द्रिय-द्वार दिव्य हों। हमारी नासिका में घ्राणेन्द्रिय शक्ति व वीर्य हो। हम निवासक तत्त्वों की प्राप्ति के लिए वीर्य को शरीर में ही व्याप्त करें तथा यज्ञशील बनकर भोगवृत्ति से ऊपर उठें।
Subject
घ्राणेन्द्रिय का बल