Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 47

61 Mantra
21/47
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- भुरिगाकृतिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षद॒ग्निꣳ स्वि॑ष्ट॒कृत॒मया॑ड॒ग्नि॒र॒श्विनो॒श्छाग॑स्य ह॒विषः॑ प्रि॒या धामा॒न्यया॒ट् सर॑स्वत्या मे॒षस्य॑ ह॒विषः॑ प्रि॒या धामा॒न्यया॒डिन्द्र॑स्यऽऋष॒भस्य॑ ह॒विषः॑ प्रि॒या धामा॒न्यया॑ड॒ग्नेः प्रि॒या धामा॒न्यया॒ट् सोम॑स्य प्रि॒या धामा॒न्यया॒डिन्द्र॑स्य सु॒त्राम्णः॑ प्रि॒या धामा॒न्यया॑ट् सवि॒तुः प्रि॒या धामा॒न्यया॒ड् वरु॑णस्य प्रि॒या धामा॒न्यया॒ड् वन॒स्पतेः॑ प्रि॒या पाथा॒स्यया॑ड् दे॒वाना॑माज्य॒पानां॑ प्रि॒या धामा॑नि॒ यक्ष॑द॒ग्नेर्होतुः॑ प्रि॒या धामा॑नि॒ यक्ष॒त् स्वं म॑हि॒मान॒माय॑जता॒मेज्या॒ऽइषः॑ कृ॒णोतु॒ सोऽअ॑ध्व॒रा जा॒तवे॑दा जु॒षता॑ ह॒विर्होत॒र्यज॑॥४७॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। अ॒ग्निम्। स्वि॒ष्ट॒कृत॒मिति॑ स्विष्ट॒ऽकृत॑म्। अया॑ट्। अ॒ग्निः। अ॒श्विनोः॑। छाग॑स्य। ह॒विषः॑। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। सर॑स्वत्याः। मे॒षस्य॑। ह॒विषः॑। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। इन्द्र॑स्य। ऋ॒ष॒भस्य॑। ह॒विषः॑। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। अ॒ग्नेः। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। सोम॑स्य। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। इन्द्र॑स्य। सु॒त्राम्ण॒ इति॑ सु॒ऽत्राम्णः॑। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। स॒वि॒तुः प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। वरु॑णस्य। प्रि॒या। धामा॑नि। अया॑ट्। वन॒स्पतेः॑। प्रि॒या। पाथा॑सि। अया॑ट्। दे॒वाना॑म्। आ॒ज्य॒पाना॒मित्या॑ज्य॒ऽपाना॑म्। प्रि॒या। धामा॑नि। यक्ष॑त्। अ॒ग्नेः। होतुः॑। प्रि॒या। धामा॑नि। य॒क्ष॒त्। स्वम्। म॒हि॒मान॑म्। आ। य॒ज॒ता॒म्। एज्या॒ इत्या॒ऽइज्याः॑। इषः॑। कृ॒णोतु॑। सः। अ॒ध्व॒रा। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दाः। जु॒षता॑म्। ह॒विः। होतः॑। यज॑ ॥४७ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षदग्निँ स्विष्टकृतमयाडग्निरश्विनोश्छागस्य हविषः प्रिया धामान्ययाट्सरस्वत्या मेषस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्यऽऋषभस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडग्नेः प्रिया धामान्ययाट्सोमस्य प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य सुत्राम्णः प्रिया धामान्ययाट्सवितुः प्रिया धामान्ययाड्वरुणस्य प्रिया धामान्ययाड्वनस्पतेः प्रिया पाथाँस्ययाड्देवानामाज्यपानाम्प्रिया धामानि यक्षदग्नेर्हातुः प्रिया धामानि यक्षत्स्वम्महिमानमायजतामेज्याऽइषः कृणोतु सोऽअध्वरा जातवेदा जुषताँ हविर्हातर्यज ॥

होता। यक्षत्। अग्निम्। स्विष्टकृतमिति स्विष्टऽकृतम्। अयाट्। अग्निः। अश्विनोः। छागस्य। हविषः। प्रिया। धामानि। अयाट्। सरस्वत्याः। मेषस्य। हविषः। प्रिया। धामानि। अयाट्। इन्द्रस्य। ऋषभस्य। हविषः। प्रिया। धामानि। अयाट्। अग्नेः। प्रिया। धामानि। अयाट्। सोमस्य। प्रिया। धामानि। अयाट्। इन्द्रस्य। सुत्राम्ण इति सुऽत्राम्णः। प्रिया। धामानि। अयाट्। सवितुः प्रिया। धामानि। अयाट्। वरुणस्य। प्रिया। धामानि। अयाट्। वनस्पतेः। प्रिया। पाथासि। अयाट्। देवानाम्। आज्यपानामित्याज्यऽपानाम्। प्रिया। धामानि। यक्षत्। अग्नेः। होतुः। प्रिया। धामानि। यक्षत्। स्वम्। महिमानम्। आ। यजताम्। एज्या इत्याऽइज्याः। इषः। कृणोतु। सः। अध्वरा। जातवेदा इति जातऽवेदाः। जुषताम्। हविः। होतः। यज॥४७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = यज्ञशील पुरुष (स्विष्टकृतम्) उत्तम इष्टों को सिद्ध करनेवाले (अग्निम्) = इस यज्ञाग्नि का (यक्षत्) = अपने साथ मेल करता है, अर्थात् यज्ञ को अपने साथ जोड़ लेता है, २. सहयज्ञ बनने पर (अग्निः) = यह यज्ञाग्नि [क] (अश्विनोः) = प्राणापान के साथ सम्बद्ध (छागस्य हविषः) = अजमोद ओषधि की हवि के (प्रिया धामानि) = प्रिय तेजों को (अयाट्) = हमारे साथ सङ्गत करता है [ख] (सरस्वत्या) = ज्ञानाधिदेवता से सम्बद्ध (मेषस्य हविषः) = मेढ़ासिंगी ओषधि की हवि के (प्रिया धामानि) = प्रिय तेजों को (अयाट्) = हमारे साथ सङ्गत करता है। [ग] (इन्द्रस्य) = आत्मशक्ति के साथ सम्बद्ध (ऋषभस्य हविषः) = ऋषभक ओषधि की हवि के (प्रिया धामानि) = प्रिय तेजों को (अयाट्) = हमारे साथ सम्बद्ध करता है। [घ] (अग्नेः प्रिया धामानि अयाट्) = अग्नितत्त्व के प्रिय तेजों को हमारे साथ सम्बद्ध करता है। [ङ] (सोमस्य प्रिया धामानि अयाट्) = सोम के प्रिय तेजों को हमारे साथ सम्बद्ध करता है। [च] (सुत्राम्णः इन्द्रस्य प्रिया धामानि अयाट्) = अपनी पूर्णरूप से रक्षा करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुष के प्रिय तेजों को हमारे साथ सङ्गत करता है। [छ] (सवितुः प्रिया धामानि अयाट्) = यह निर्माण करनेवाले सविता के प्रिय तेजों को हमारे साथ सङ्गत करता है। [ज] निर्माण में लगाये रखकर (वरुणस्य) = द्वेष निवारण की देवता के (प्रिया धामानि) = प्रिय तेजों को (अयाट्) = हमारे साथ सङ्गत करता है [ञ] यह (वनस्पतेः) = वनस्पति के (प्रिया पाथांसि) = प्रिय अन्नों को (अयाट्) = हमारे साथ सङ्गत करता है। [त्र] (आज्यपानाम्) = घृत का पान करनेवाले (देवानाम्) = दिव्य वृत्तिवाले पुरुषों के (प्रिया धामानि अयाट्) = प्रिय तेजों को हमारे साथ सङ्गत करता है। [ट] यह (होतुः) = दानपूर्वक अदन करनेवाले (अग्नेः) = प्रगतिशील पुरुष के (प्रिया धामानि) = प्रिय तेजों को (यक्षत्) = हमारे साथ सङ्गत करता है। ३. इस प्रकार यज्ञाग्नि के द्वारा उल्लिखित प्रिय तेजों को प्राप्त करके मन्त्र का ऋषि 'आत्रेय' (स्वं महिमानम्) = अपनी महिमा को (यक्षत्) = अपने साथ सङ्गत करे। ४. इस महिमा को पूर्णतया प्राप्त करने के लिए (एज्या:) = आ इज्या:=समन्तात् यष्टुं योग्यं, अर्थात् सब प्रकार से अपने साथ मेल करने के योग्य (इषः) = इच्छाओं को (आयजताम्) = अपने साथ सङ्गत करे, अर्थात् सदा उत्तम इच्छाओंवाला हो । ५. (सः जातवेदा:) = यह ज्ञानी पुरुष (अध्वरा कृणोतु) = सदा हिंसारहित यज्ञों का करनेवाला हो । अहिंसा ही मूलधर्म है। इस प्रकार यज्ञिय जीवन बिताता हुआ वह (हविः जुषताम्) = त्यागपूर्वक भोजन का सेवन करें, सदा यज्ञशेष ही खाये । ६. प्रभु कहते हैं (होत:) = हे यज्ञशील पुरुष ! तूने (यज) = यजन करनेवाला होना है।
Essence
भावार्थ-यज्ञाग्नि स्विष्टकृत् है। यज्ञ को अपनाकर हम सब तेजों को अपनाएँ। अपनी वास्तविक महिमा को प्राप्त करें। अहिंसा को मूलधर्म समझें ।
Subject
इष्टकामधुक् [स्विष्टकृत् ] अग्नि