Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 43

61 Mantra
21/43
Devata- होत्रादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- आद्यस्य याजुषी पङ्क्तिः, कृति Swara- पञ्चमः, षड्जः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षद॒श्विनौ॒ छाग॑स्य ह॒विष॒ऽआत्ता॑म॒द्य म॑ध्य॒तो मेद॒ऽउद्भृ॑तं पु॒रा द्वेषो॑भ्यः पु॒रा पौरु॑षेय्या गृ॒भो घस्तां॑ नू॒नं घा॒सेऽअ॑ज्राणां॒ यव॑सप्रथमाना सु॒मत्क्ष॑राणा शतरु॒द्रिया॑णामग्निष्वा॒त्तानां॒ पीवो॑पवसनानां पार्श्व॒तः श्रो॑णि॒तः शि॑ताम॒तऽउ॑त्साद॒तोऽङ्गा॑दङ्गा॒दव॑त्तानां॒ कर॑तऽए॒वाश्विना॑ जु॒षेता॑ ह॒विर्होत॒र्यज॑॥४३॥

हो॒ता। य॒क्ष॒त्। अ॒श्विनौ॑। छाग॑स्य। ह॒विषः॑। आत्ता॑म्। अ॒द्य। म॒ध्य॒तः। मेदः॑। उद्भृ॑त॒मित्युत्ऽभृ॑तम्। पु॒रा। द्वेषो॑भ्य॒ इति॒ द्वेषः॑ऽभ्यः। पु॒रा। पौरु॑षेय्याः। गृ॒भः। घस्ता॑म्। नू॒नम्। घा॒सेऽअ॑ज्राणा॒मिति॑ घा॒सेऽअ॑ज्राणाम्। यव॑सप्रथमाना॒मिति॒ यव॑सऽप्रथमानाम्। सु॒मत्क्ष॑राणा॒मिति॑ सु॒मत्ऽक्ष॑राणाम्। श॒त॒रु॒द्रिया॑णा॒मिति॑ शतऽरु॒द्रिया॑णाम्। अ॒ग्नि॒ष्वा॒त्ताना॑म्। अ॒ग्नि॒स्वा॒त्ताना॒मित्य॑ग्निऽस्वा॒त्ताना॑म्। पीवो॑पवसनाना॒मिति॒ पीवः॑ऽउपवसनानाम्। पा॒र्श्व॒तः श्रो॒णि॒तः। शि॒ता॒म॒तः। उ॒त्सा॒द॒त इत्यु॑त्ऽसाद॒तः। अङ्गा॑दङ्गा॒दित्यङ्गा॑त्ऽअङ्गात्। अव॑त्तानाम्। कर॑तः। एव। अ॒श्विना॑। जु॒षेता॑म्। ह॒विः। होतः॑। यज॑ ॥४३ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षदश्विनौ च्छागस्य हविषऽआत्तामद्य मध्यतो मेदऽउद्भृतम्पुरा द्वेषोभ्यः पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तान्नूनङ्घासेअज्राणाँयवसप्रथमानाँ सुमत्क्षराणाँ शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानाम्पीवोपवसानाम्पार्श्वतः श्रोणितः शितामतऽउत्सादतोङ्गाद्ङ्गादवत्तानाम्करत एवाश्विना जुषेताँ हविर्हातर्यज ॥

होता। यक्षत्। अश्विनौ। छागस्य। हविषः। आत्ताम्। अद्य। मध्यतः। मेदः। उद्भृतमित्युत्ऽभृतम्। पुरा। द्वेषोभ्य इति द्वेषःऽभ्यः। पुरा। पौरुषेय्याः। गृभः। घस्ताम्। नूनम्। घासेऽअज्राणामिति घासेऽअज्राणाम्। यवसप्रथमानामिति यवसऽप्रथमानाम्। सुमत्क्षराणामिति सुमत्ऽक्षराणाम्। शतरुद्रियाणामिति शतऽरुद्रियाणाम्। अग्निष्वात्तानाम्। अग्निस्वात्तानामित्यग्निऽस्वात्तानाम्। पीवोपवसनानामिति पीवःऽउपवसनानाम्। पार्श्वतः श्रोणितः। शितामतः। उत्सादत इत्युत्ऽसादतः। अङ्गादङ्गादित्यङ्गात्ऽअङ्गात्। अवत्तानाम्। करतः। एव। अश्विना। जुषेताम्। हविः। होतः। यज॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = यह यज्ञशील पुरुष (अश्विनौ) = प्राणापान को (यक्षत्) = अपने साथ सङ्गत करे। इस उद्देश्य से ये प्राणापान (छागस्य) = अजमोद ओषधि के (हविषः) = हवि का (आत्ताम्) = सेवन करें, अर्थात् इस ओषधि को मुख से भी ग्रहण करें और इसे अग्निकुण्ड में आहुत करके हविरूप में हुई - हुई इस औषध को श्वासवायु के साथ ग्रहण करें। २. (अद्य) = आज इस ओषधि के (मध्यतः) = मध्य से (मेदः) = इसका औषध-गुणसम्पन्न चिकना भाग, अर्थात् गूदा (उद्भृतम्) = बाहर निकाला है। (पुरा) = पूर्व इसके कि (द्वेषोभ्यः) = [द्विष अप्रीतौ] यह वायुमण्डल के प्रभाव से अप्रीतिजनक हो जाए, अर्थात् इसके रस का स्वाद कुछ विकृत हो जाए तथा (पुरा) = पूर्व इसके कि (पौरुषेय्या गृभः) = इसे कोई पुरुषों में होनेवाला रोग पकड़ ले, अर्थात् मक्खियों आदि के कारण इसमें किन्हीं रोगकृमियों का प्रवेश होने से पूर्व ही (घस्ताम्) = प्राणापान इसका भक्षण करें। सामान्यतः सेब को काटें तो कुछ देर रखने पर उसका वह चमकता हुआ सफेद रंग जाता रहता है, कुछ देर पड़े रहने पर उसके स्वाद में भी विकार आ जाता है, अतः सामान्य नियम यही ठीक है कि काटा और खाया । यहाँ भी 'ओषधि का गूदा निकाला और उसका प्रयोग किया' यही नियम रखना चाहिए। ३. (नूनम्) = निश्चय से (घासे) = खाने पर (अज्राणाम्) = [अज गतिक्षेपणयोः] रोगों को दूर फेंकनेवाली अथवा [ भोजने अग्रे प्राप्तव्यानाम् - द०] भोजन में सबसे प्रथम प्रयोग करने योग्य [अज्राणां=अजराणां नवानां रुचिजनकानाम् - म० ] भोजन में अधिकाधिक रुचि पैदा करनेवाली (यवसप्रथमानाम्) = अन्नों में मुख्य (सुमत् क्षराणाम्) = [सुष्ठु मदां क्षरः सञ्चलनं येषां - द०] उत्तम आनन्दों के देनेवाली (शतरुद्रियाणाम्) = सैकड़ों रोगों को रुलानेवाली, अर्थात् रोगों का विद्रावण करनेवाली अथवा [बहुमन्त्रैः सुतानाम् - म०] मन्त्रों से स्तवन की गई (अग्निष्वात्तानाम्) = [पाककाले पूर्वमग्निना सुशृतानाम् -म० ] जिनका अग्नि पर ठीक परिपाक हुआ है, (पीवोपवसनानाम्) = [पवी: उपवसनं यै: ] शरीर में स्थूल उपवसन का निर्माण करनेवाली, अर्थात् त्वचा के साथ-साथ सारे शरीर पर चर्बी के वस्त्र को प्राप्त करानेवाली, तथा (पार्श्वतः) = पार्श्वों के दृष्टिकोण से [कोख प्रदेशों के स्वास्थ्य के विचार से] (श्रोणितः) = कटिप्रदेश के स्वास्थ्य के विचार से, (शितामतः) = बाहुप्रदेश के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अथवा आमाशय के स्वास्थ्य के विचार से, (उत्सादत:) = छेदनवाले प्रदेश के ठीक करने के उद्देश्य से, जहाँ कोई कटाव हो गया है, उसको ठीक करने के लिए, (अंगात् अंगात्) = एक-एक अङ्ग के दृष्टिकोण से (अवत्तानाम्) = काटे हुए अजमोद ओषधि के अंशों का (करतः) = ये प्राणापान सेवन करते हैं । ४. (एव) = इस प्रकार (अश्विना) = ये प्राणापान (हविः) = उस अजमोद ओषधि का, जिसे कि अग्नि में डाला गया है और अतएव जो हविरूप हो गई है, उसका (जुषताम्) = सेवन करें । ५. (होतः) = हे यज्ञशील पुरुष ! तू (यज) = इस ओषधि का यजन करनेवाला बन।
Essence
भावार्थ- हम प्राणापान के उत्कर्ष के लिए अजमोद ओषधि के मध्य से उद्धृत गूदे का ग्रहण करें। गूदे के पड़े रहने से उसके रस को विकृत न होने दें, उसपर रोगकृमियों का आक्रमण भी न होने दें। इसके प्रयोग से हमारे सब अङ्ग स्वस्थ होंगे। हम इससे हवन करें और इसे हविरूप में लेने का प्रयत्न करें।
Subject
'अजमोद' का प्रयोग व यजन