Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 4

61 Mantra
21/4
Devata- अग्निवरुणौ देवते Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स त्वं नो॑ऽअग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठोऽअ॒स्याऽउ॒षसो॒ व्युड्टष्टौ।अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑ण॒ꣳ ररा॑णो वी॒हि मृ॑डी॒कꣳ सु॒हवो॑ नऽएधि॥४॥

सः। त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। अ॒व॒मः। भ॒व॒। ऊ॒ती। नेदि॑ष्ठः। अ॒स्याः। उ॒षसः॑। व्यु॑ष्टा॒विति॒ विऽउ॑ष्टौ। अव॑। य॒क्ष्व॒। नः॒। वरु॑णम्। ररा॑णः। वी॒हि। मृ॒डी॒कम्। सु॒हव॒ इति॑ सु॒ऽहवः॑। नः॒। ए॒धि॒ ॥४ ॥

Mantra without Swara
स त्वन्नोऽअग्ने वमो भवोती नेदिष्ठोऽअस्या उषसो व्युष्टौ । अवयक्ष्व नो वरुणँ रराणो वीहि मृडीकँ सुहवो न एधि ॥

सः। त्वम्। नः। अग्ने। अवमः। भव। ऊती। नेदिष्ठः। अस्याः। उषसः। व्युष्टाविति विऽउष्टौ। अव। यक्ष्व। नः। वरुणम्। रराणः। वीहि। मृडीकम्। सुहव इति सुऽहवः। नः। एधि॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (अग्ने) = अग्निवत् प्रकाशमान विद्वन् ! (सः त्वम्) = वह आप (नः) = हमारे (अवम:) = अत्यन्त रक्षक (भवः) = होओ। २. (अस्याः उषसो व्युष्टौ) = इस उषःकाल के आने पर, अन्धकार के दूर होने पर आप (ऊती) = रक्षा के दृष्टिकोण से (नेदिष्ठः) = अन्तिकतम हो। आपके सामीप्य में मैं बुराइयों से बचा रहूँगा और ३. (रराण:) = [रा दाने] उत्तम ज्ञान देते हुए आप (नः) = हमें (वरुणं अवयक्ष्व) = द्वेष-निवारण करनेवाले प्रभु के साथ सङ्गत कीजिए, अर्थात् यह विद्वानों का दिया हुआ ज्ञान हमें प्रभु के साथ सङ्गत करनेवाला हो। ४. इस प्रकार आप हमें (मृडीकम्) = सुख को (वीहि) = प्राप्त कराइए। ५. आप (नः) = हमारे लिए (सुहवः) = सुगमता से पुकारने योग्य (एधि) = होओ। हम जब-जब ज्ञान-प्राप्ति के लिए आपको पुकारें तब-तब आप हमारी पुकार को सुनें ।
Essence
भावार्थ- हमें प्रतिदिन विद्वानों का सङ्ग प्राप्त हो। वे हमें ज्ञान के द्वारा प्रभु से सङ्गत करें और इस प्रकार हमें सुखी करें। सत्सङ्ग के द्वारा अपने में उत्तमगुणों को उत्पन्न करनेवाला यह व्यक्ति 'वामदेव' बनता है।
Subject
सत्सङ्ग