Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 39

61 Mantra
21/39
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒द् वन॒स्पति॑ꣳ शमि॒तार॑ꣳ श॒तक्र॑तुं भी॒मं न म॒न्युꣳ राजा॑नं व्या॒घ्रं नम॑सा॒श्विना॒ भाम॒ꣳ सर॑स्वती भि॒षगिन्द्रा॑य दुहऽइन्द्रि॒यं पयः॒ सोमः॑ परि॒स्रुता॑ घृ॒तं मधु व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३९॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। वन॒स्पति॑म्। श॒मि॒तार॑म्। श॒तक्र॑तु॒मिति॑ श॒तऽक्र॑तुम्। भी॒मम्। न। म॒न्युम्। राजा॑नाम्। व्या॒घ्रम्। नम॑सा। अ॒श्विना। भाम॑म्। सर॑स्वती। भि॒षक्। इन्द्रा॑य। दु॒हे॒। इ॒न्द्रि॒यम्। पयः॑। सोमः॑। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। घृ॒तम्। मधु॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३९ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षद्वनस्पतिँ शमितारँ शतक्रतुम्भीमन्न मन्युँ राजानँ व्याघ्रन्नमसाश्विना भामँ सरस्वती भिषगिन्द्राय दुहऽइन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतम्मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। वनस्पतिम्। शमितारम्। शतक्रतुमिति शतऽक्रतुम्। भीमम्। न। मन्युम्। राजानाम्। व्याघ्रम्। नमसा। अश्विना। भामम्। सरस्वती। भिषक्। इन्द्राय। दुहे। इन्द्रियम्। पयः। सोमः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। घृतम्। मधु। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = त्यागपूर्वक अदन करनेवाला (वनस्पतिम्) = ज्ञान की किरणों के पति को (यक्षत्) = अपने साथ सङ्गत करता है, अर्थात् ज्ञान की किरणों का पति बनता है। (शमितारम्) = शान्त वृत्तिवाले को अपने साथ सङ्गत करता है। शतक्रतुम् अनन्त प्रज्ञावाले को अथवा सौ-केसौ वर्ष यज्ञमय जीवनवाले को न तथा (भीमम्) = शत्रुओं के लिए भयंकर को, (मन्युम्) = विचारशील को, (राजानम्) = बड़े व्यवस्थित जीवनवाले को, (व्याघ्रम्) = [वि आ जिघ्रति] विविध विज्ञानों की समन्ततः गन्ध ग्रहण करनेवाले को, अर्थात् यह होता अपने जीवन को उल्लिखित गुणों से युक्त बनाता है। २. (नमसा) = नम्रता के द्वारा तथा परमेश्वर के प्रति नमन के द्वारा अश्विना यह अपने साथ प्राणापान को तथा (भामम्) = तेजस्विता को सङ्गत करता है। वस्तुतः विनीतता से प्राणशक्ति व तेज की वृद्धि होती है। अभिमान व अक्खड़पन से प्राणशक्ति व तेजस्विता की हानि ही होती है। ३. (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता भिषक् - इस होता के लिए वैद्य होती है और (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए इन्द्रियम् दुहे इन्द्रियों की शक्ति का पूरण करती है। ४. यह जितेन्द्रिय पुरुष चाहता है कि उसे (पयः सोमः) = दूध, सोमरस परिस्स्रुता फलों के रस के साथ (घृतं मधु) = घृत और मधु व्यन्तु प्राप्त हों । ५. इस जितेन्द्रिय पुरुष से प्रभु कहते हैं कि हे (होतः) = यज्ञशील पुरुष ! तू (आज्यस्य यज) = घृत का यजन कर। घृत को खा भी, परन्तु अग्निहोत्र करना न भूल। यही बात तुझे 'होता' बनाएगी।
Essence
भावार्थ- होता पुरुष ज्ञान की किरणों का पति, शान्त, अनन्त प्रज्ञानवाला व यज्ञशील, शत्रुओं के लिए भयंकर, विचारशील, व्यवस्थित जीवनवाला व व्यापक ज्ञानवाला बनता है। यह नम्रता के द्वारा प्राणापान व तेजस्विता को धारण करता है। ज्ञानाधिदेवता इसे इन्द्रियों की शक्ति से पूर्ण करती है। इसे दूध आदि उत्तम पदार्थ प्राप्त होते हैं। यह उनका यज्ञशेष के रूप में सेवन करता है।
Subject
वनस्पति-यजन