Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 36

61 Mantra
21/36
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒द् दैव्या॒ होता॑रा भि॒षजा॒श्विनेन्द्रं॒ न जागृ॑वि॒ दिवा॒ नक्तं॒ न भे॑ष॒जैः शूष॒ꣳ सर॑स्वती भि॒षक् सीसे॑न दु॒हऽइन्द्रि॒यं पयः॒ सोमः॑ परि॒स्रुता॑ घृ॒तं मधु॒ व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३६॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। दैव्या॑। होता॑रा। भि॒षजा॑। अ॒श्विना॑। इन्द्र॑म्। न। जागृ॑वि। दिवा॑। नक्त॑म्। न। भे॒ष॒जैः। शूष॑म्। सर॑स्वती। भि॒षक्। सीसे॑न। दु॒हे॒। इ॒न्द्रि॒यम्। पयः॑। सोमः॑। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। घृ॒तम्। मधु॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३६ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षद्दैव्या होतारा भिषजाश्विनेन्द्रन्न जागृवि दिवा नक्तन्न भेषजैः शूषँ सरस्वती भिषक्सीसेन दुह इन्द्रियम्पयः सोमः परिस्रुता घृतम्मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। दैव्या। होतारा। भिषजा। अश्विना। इन्द्रम्। न। जागृवि। दिवा। नक्तम्। न। भेषजैः। शूषम्। सरस्वती। भिषक्। सीसेन। दुहे। इन्द्रियम्। पयः। सोमः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। घृतम्। मधु। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥३६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (दैव्या होतारा) = [अयं चाग्निरसौ च मध्यमः - नि० ७।३०] अग्नि और वायुतत्त्व को (यक्षत्) अपने साथ सङ्गत करता है। अग्नितत्त्व इसके मलों को भस्म करनेवाला तथा प्रकाश प्राप्त करानेवाला है, और वायुतत्त्व इसके बल का कारण बनता है। २. वह होता अश्विना प्राणापान को भी अपने साथ सङ्गत करता है जो प्राणापान (भिषजा) = इसके वैद्य होते हैं। ३. (न) = और यह होता (जागृवि इन्द्रम्) = जागरणशील, अप्रमत्त आत्मा को अपने साथ सङ्गत करता है । ४. (न) = और वह (होता दिवा नक्तम्) = दिन-रात (भेषजैः) = रोगनिवर्तनों के द्वारा (शूषम्) = शत्रुओं के शोषक बल को अपने साथ सङ्गत करता है। रोग ही बल का क्षय करते हैं । ५. (सरस्वती भिषक्) = यह ज्ञानाधिदेवतारूप वैद्य (सीसेन) = नागभस्म द्वारा (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों की शक्तियों को दुहे पूरित करती है। ६. (पयः सोमः) = दूध सदा व सोमलता का रस तथा परिस्रुता = फलों के रस के साथ (घृतं मधु) = घृत और शहद को व्यन्तु प्राप्त हों, परन्तु हे (होत:) = यज्ञशील पुरुष ! तू आज्यस्य यज-घृत का हवन करनेवाला बन ।
Essence
भावार्थ- होता अपने साथ अग्नि तथा वायुतत्त्व को, वैद्यभूत प्राणापान को, अप्रमत्त आत्मतत्त्व को, दिन-रात रोगनिवारणों के साथ बल को सङ्गत करता है और ज्ञानाधिदेवता नागभस्मादि धातु निर्मित ओषधियों से शक्ति को पूरित करती है। दूध आदि पदार्थों को यह प्राप्त करता है, परन्तु अग्निहोत्र अधिक करता है।
Subject
दैव्य होतृ-यजन