Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 33

61 Mantra
21/33
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षद् ब॒र्हि॒रूर्ण॑म्रदा भि॒षङ् नास॑त्या भि॒षजा॒श्विनाश्वा॒ शिशु॑मती भि॒षग्धे॒नुः सर॑स्वती भि॒षग्दु॒हऽइन्द्रा॑य भेष॒जं पयः॒ सोमः॑ परि॒स्रु॒ता घृ॒तं मधु॒ व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३३॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। ब॒र्हिः। ऊर्ण॑म्रदा॒ इत्यूर्ण॑ऽम्रदाः। भि॒षक्। ना॑सत्या। भि॒षजा॑। अ॒श्विना॑। अश्वा॑। शिशु॑म॒तीति॒ शिशु॑ऽमती। भि॒षक्। धे॒नुः। सर॑स्वती। भि॒षक्। दु॒हे। इन्द्रा॑य। भे॒ष॒जम्। पयः॑। सोमः॑। प॒रि॒स्रु॒तेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। घृ॒तम्। मधु॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३३ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षद्बर्हिरूर्णम्रदा भिषङ्नासत्या भिषजाश्विनाश्वा शिशुमती भिषग्धेनुः सरस्वती भिषग्दुहऽइन्द्राय भेषजम्पयः सोमः परिस्रुता घृतम्मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। बर्हिः। ऊर्णम्रदा इत्यूर्णऽम्रदाः। भिषक्। नासत्या। भिषजा। अश्विना। अश्वा। शिशुमतीति शिशुऽमती। भिषक्। धेनुः। सरस्वती। भिषक्। दुहे। इन्द्राय। भेषजम्। पयः। सोमः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। घृतम्। मधु। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (ऊर्णम्रदा:) = [ऊर्णं-आच्छादकं = वृत्रं मृद्नाति] ज्ञान के आवरणभूत वृत्र का विनाश करनेवाला बनकर, कामादि वासनाओं को नष्ट करके (बर्हिः) = जिसमें से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है, ऐसे वासनाशून्य हृदय का (यक्षत्) = अपने साथ सङ्ग [मेल] करता है। यह (ऊर्णम्रदाः भिषज्) = स्वयं अपना वैद्य होता है। २. ऐसा होने पर नासत्या ये नासिका में होनेवाले (अश्विना) = प्राणापान भी (भिषजा) = इसके वैद्य बनते हैं, अर्थात् वासनाओं का विनाश करना ही वैद्य बनना है। वासनाओं का विनाश होने पर ही प्राणापान वैद्य होते हैं। वासनामय जीवन में प्राणापान की शक्ति क्षीण हो जाती है। उन्होंने रोगों को क्या दूर करना ? ३. प्राणापान के वैद्य के रूप में होने पर एक (गृहिणी अश्वा) = सदा उत्तम कर्मों में व्याप्त, सबल व (शिशुमती) = उत्तम सन्तानोंवाली होती है। ४. इस गृहिणी के लिए (धेनुः) = घर में रखी हुई गौ (भिषक्) = वैद्य हो जाती है, क्योंकि गोदुग्ध शरीर को ही नहीं मन व बुद्धि को भी नीरोग करता है । ५. इसके लिए (सरस्वती) = ज्ञान की अधिदेवता भी (भिषक्) = वैद्य होती है। ज्ञानपूर्वक किया गया वस्तुओं का उपयोग रोगों को नहीं आने देता। ये वैद्यभूता सरस्वती (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (भेषजं दुहे) = औषध को दुहती है, प्राप्त कराती है। अजितेन्द्रिय के लिए औषध का कोई लाभ नहीं । ६. यह जितेन्द्रिय पुरुष प्रार्थना करता है कि (पयः) = दूध, (सोमः) = सोमरस, (परिस्स्रुता) = फलों के रस के साथ (घृतं मधु) = घृत व शहद व्यन्तु हमें प्राप्त हों। ७. प्रभु कहते हैं कि हे (होतः) = त्यागपूर्वक अदन करनेवाले! तू (आज्यस्य) = घृत का (यज) = यजन कर खा भी, परन्तु अग्निहोत्र अधिक कर ।
Essence
भावार्थ- होता वृत्र को कुचलकर, पवित्र हृदय को अपने साथ सङ्गत करता है। इसके लिए प्राणापान वैद्य होते हैं। इन वैद्योंवाली माता कर्मों में व्याप्त व उत्तम सन्तानवाली होती है। इनके लिए गौ तथा ज्ञानाधिदेवता वैद्य हो जाते हैं। हम जितेन्द्रिय बनकर दूध आदि उत्तम पदार्थों का सेवन करें। घृत आदि को खाएँ, परन्तु अग्निहोत्र अधिक करें।
Subject
बर्हिर्यजन