Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 32

61 Mantra
21/32
Devata- सरस्वत्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- विराडतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षदि॒डेडि॒तऽआ॒ जु॒ह्वा॑नः॒ सर॑स्वती॒मिन्द्रं बले॑न व॒र्धय॑न्नृष॒भेण॒ गवे॑न्द्रि॒यम॒श्विनेन्द्रा॑य भेष॒जं यवैः॑ क॒र्कन्धु॑भि॒र्मधु॑ ला॒जैर्न मास॑रं॒ पयः॒ सोमः॑ परि॒स्रुता॑ घृ॒तं मधु॒ व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३२॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। इ॒डा। ई॒डि॒तः। आ॒जुह्वा॑न॒ इत्या॒ऽजुह्वा॑नः। सर॑स्वतीम्। इन्द्र॑म्। बले॑न। व॒र्धय॑न्। ऋ॒ष॒भेण॑। गवा॑। इ॒न्द्रि॒यम्। अ॒श्विना॑। इन्द्रा॑य। भे॒ष॒जम्। यवैः॑। क॒र्कन्धु॑भि॒रिति॑ क॒र्कन्धु॑ऽभिः। मधु॑। ला॒जैः। न। मास॑रम्। पयः॑। सोमः॑। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। घृ॒तम्। मधु॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३२ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षदिडेडितऽआजुह्वानः सरस्वतीमिन्द्रम्बलेन वर्धयन्नृषभेण गवेन्द्रियमश्विनेन्द्राय भेषजँयवै र्कर्कन्धुभिर्मधु लाजैर्न मासरम्पयः सोमः परिस्रुता घृतम्मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। इडा। ईडितः। आजुह्वान इत्याऽजुह्वानः। सरस्वतीम्। इन्द्रम्। बलेन। वर्धयन्। ऋषभेण। गवा। इन्द्रियम्। अश्विना। इन्द्राय। भेषजम्। यवैः। कर्कन्धुभिरिति कर्कन्धुऽभिः। मधु। लाजैः। न। मासरम्। पयः। सोमः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। घृतम्। मधु। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (ईडितः) = [ईडितम् अस्य अस्तीति] उपासनावाला होकर (इडा) = [इडाम्-म० ] इडा को श्रद्धा को व प्रशंसित ज्ञानवाणी को (यक्षत्) = अपने साथ जोड़ता है। २. श्रद्धा व ज्ञानवाणियों से यह (सरस्वतीम् आजुह्वान:) = सरस्वती को अपने में ,पुकार रहा होता है और सरस्वती का आराधन करके अपने ज्ञान को बढ़ा रहा होता है। ३. यह (बलेन) = बल के धारण से (इन्द्रम्) = प्रभु को (वर्धयन्) = बढ़ाता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'= बलहीन से आत्मतत्त्व अप्राप्य है, यह सबल होकर उस आत्मतत्त्व को प्राप्त करता है । ४. (ऋषभेण) = [ऋष गतौ, गन्तुं योग्येन-द०] क्रिया में परिणत होनेवाले (गवा) = [गमयन्ति अर्थम्] वेदज्ञान से यह (इन्द्रियम्) = ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को वर्धयन् बढ़ाता है। गति कर्मेन्द्रियों को सशक्त करती है और ज्ञान ज्ञानेन्द्रियों को । ५. (अश्विना प्राणापान इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (भेषजम्) = औषध होते हैं । ६. (यवैः) = जौ के साथ तथा (कर्कन्धुभिः) = बेरों के साथ (मधु) = शहद (न) = और (लाजैः) = लाजाओं के साथ, अक्षत धान्यों के साथ (मासरम्) = ओदन= भात। ये इन्द्र के लिए भेषज हो जाते हैं । ७. यह इन्द्र प्रार्थना करता है कि (पय:) = दूध, (सोमः) = सोमरस, (परिस्रुता) = फलों के रस के साथ (घृतं मधु) = घृत और शहद ये वस्तुएँ (व्यन्तु) = हमें प्राप्त हों। ८. प्रभु कहते हैं कि हे (होत:) = त्यागपूर्वक अदन करनेवाले ! तू (आज्यस्य यज) = इस घृत का सेवन भी कर, परन्तु अग्निहोत्र अधिक कर।
Essence
भावार्थ- होता श्रद्धा व ज्ञान की वाणी का अपने साथ मेल करता है। यह सरस्वती की आराधना करता है। बल से आत्मतत्त्व का वर्धन करता है, गति व ज्ञान-प्राप्ति से ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को सशक्त करता है। प्राणापान इसके लिए वैद्य हो जाते हैं। 'बेर, यव, मधु, लाजा व मासर' आदि पदार्थ इसके लिए भेषज का काम करते हैं। यह होता परन्तु अग्निहोत्र अधिक करता है। घृतादि का सेवन करता है,
Subject
इडा-यजन