Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 25

61 Mantra
21/25
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
व॒र्षाभि॑र्ऋ॒तुना॑दि॒त्या स्तोमे॑ सप्तद॒शे स्तु॒ताः।वै॒रू॒पेण॑ वि॒शौज॑सा ह॒विरिन्द्रे॒ वयो॑ दधुः॥२५॥

व॒र्षाभिः॑। ऋ॒तुना॑। आ॒दि॒त्याः। स्तोमे॑। स॒प्त॒द॒श इति॑ सप्तऽद॒शे। स्तु॒ताः। वै॒रू॒पेण॑। वि॒शा। ओज॑सा। ह॒विः। इन्द्रे॑। वयः॑। द॒धुः॒ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
वर्षाभिरृतुनादित्या स्तोमे सप्तदशे स्तुताः । वैरूपेण विशौजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः ॥

वर्षाभिः। ऋतुना। आदित्याः। स्तोमे। सप्तदश इति सप्तऽदशे। स्तुताः। वैरूपेण। विशा। ओजसा। हविः। इन्द्रे। वयः। दधुः॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इन्द्रे) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जितेन्द्रिय पुरुष में (हविः) = त्यागपूर्वक अदन को तथा (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को (दधुः) = धारण करते हैं। कौन ? २. (आदित्या) = आदित्यदेव, जिन्होंने ४८ वर्षपर्यन्त आचार्यों के समीप रहकर सब आदान करने योग्य विज्ञानों व गुणों का ग्रहण किया है [आदानात् आदित्या] जैसेकि मेघ जल का आदान करते हैं। ३. अब ये आदित्य (वर्षाभिः ऋतुना) = वर्षाऋतु से स्तुताः =स्तुत होते हैं। वर्षाऋतु में मेघ चारों ओर जल की वृष्टि करके लोगों के सन्ताप को हरते हैं। ये आदित्यदेव भी चारों ओर ज्ञानजल की वर्षा करते हुए लोगों के कष्टों का निवारण करते हैं। ४. और (सप्तदशे स्तोमे स्तुताः) = सत्रह तत्त्वों से बने हुए समूह के निमित्त स्तुत होते हैं। ये सत्रह तत्त्वों से बना हुआ शरीर ही सूक्ष्मशरीर है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धि ये सत्रह तत्त्व मिलकर यह सूक्ष्मशरीर बना है। 'आदित्य' देव अपने इस सूक्ष्मशरीर के कारण निरन्तर प्रशंसित होते हैं। ५. इस सूक्ष्मशरीर को अच्छा बनाने के कारण ही ये आदित्य (वैरूपेण विशा ओजसा) = विशिष्ट रूपवाली सन्तान से और ओज से अथवा विशिष्ट रूपवाले तथा लोगों के हृदयों में प्रवेश करनेवाले, उनपर प्रभाव डालनेवाले तेज से युक्त होते हैं।
Essence
भावार्थ-आदित्यदेव वे हैं जो वर्षाऋतु के समान शान्ति देनेवाले ज्ञानजल को बरसाते हैं, सूक्ष्मशरीर को सुन्दर बनाने से स्तुत होते हैं और विशिष्ट रूपवाले प्राभाविक ओजसे युक्त हैं। ये इन्द्र में त्यागपूर्वक अदन की भावना को तथा उत्कृष्ट जीवन को धारण करते हैं।
Subject
आदित्याः