Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 2

61 Mantra
21/2
Devata- वरुणो देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदाशा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भिः॑। अहे॑डमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शꣳस॒ मा न॒ऽआयुः॒ प्र मो॑षीः॥२॥

तत्। त्वा॒। या॒मि॒। ब्रह्म॑णा। वन्द॑मानः। तत्। आ। शा॒स्ते॒। यज॑मानः। ह॒विर्भि॒रिति॑ ह॒विःऽभिः॑। अहे॑डमानः। व॒रु॒ण॒। इ॒ह। बो॒धि॒। उरु॑शꣳसेत्युरु॑ऽशꣳस। मा। नः॒। आयुः॑। प्र। मो॒षीः॒ ॥२ ॥

Mantra without Swara
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशँस मा न आयुः प्रमोषीः ॥

तत्। त्वा। यामि। ब्रह्मणा। वन्दमानः। तत्। आ। शास्ते। यजमानः। हविर्भिरिति हविःऽभिः। अहेडमानः। वरुण। इह। बोधि। उरुशꣳसेत्युरुऽशꣳस। मा। नः। आयुः। प्र। मोषीः॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ब्रह्मणा) = स्तोत्रों से व वेदज्ञान से (वन्दमानः) = आपका स्तवन करता हुआ (त्वा) = आपसे (तत्) = वही बात (यामि) = [याचामि] चाहता हूँ, (यजमानः) = यज्ञशील पुरुष (हविर्भिः) = हवियों के द्वारा, अर्थात् दानपूर्वक अदन के द्वारा (तत्) = वही (आशास्ते) = इच्छा करता है कि हे (वरुण) = द्वेष का निवारण करके हमें श्रेष्ठ बनानेवाले प्रभो! (इह) = इस मानव-जीवन में (अहेडमान:) = हमपर क्रोध न करते हुए आप हमें (बोधि) = बोधयुक्त कीजिए। हे (उरुशंस) = बहुतों से स्तुति किये गये प्रभो! आप (नः) = हमारे (आयु:) = जीवन को (मा प्रमोषी:) = मत चुरने दीजिए। हमारी आयु को आप व्यर्थ न जाने दीजिए। २. ज्ञान-प्राप्ति व जीवन को सार्थक करने के दो ही उपाय हैं- [क] हम वेदज्ञान से प्रभु का स्तवन करें तथा [ख] यज्ञशील बनकर हविर्भुक् बनें, दान देकर बचे हुए को खानेवाले हों, केवलादी न बन जाएँ।
Essence
भावार्थ- ज्ञान व यज्ञ ही जीवन को सार्थक बनानेवाले हैं।
Subject
ज्ञान+यज्ञ