Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 19

61 Mantra
21/19
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ति॒स्रऽइडा॒ सर॑स्वती॒ भार॑ती म॒रुतो॒ विशः॑।वि॒राट् छन्द॑ऽइ॒हेन्द्रि॒यं धे॒नुर्गौर्न वयो॑ दधुः॥१९॥

ति॒स्रः। इडा॑। सर॑स्वती। भार॑ती। म॒रुतः॑। विशः॑। वि॒राडिति॑ वि॒ऽराट्। छन्दः॑। इ॒ह। इ॒न्द्रि॒यम्। धे॒नुः। गौः। न। वयः॑। द॒धुः॒ ॥१९ ॥

Mantra without Swara
तिस्रऽइडा सरस्वती भारती मरुतो विशः । विराट्छन्दऽइहेन्द्रियन्धेनुर्गौर्न वयो दधुः ॥

तिस्रः। इडा। सरस्वती। भारती। मरुतः। विशः। विराडिति विऽराट्। छन्दः। इह। इन्द्रियम्। धेनुः। गौः। न। वयः। दधुः॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इडा सरस्वती भारती तिस्रः) = श्रद्धा, ज्ञानाधिदेवता तथा वाणी-ये तीन, तथा २. (मरुतो विश:) = [मितराविणः, महद् द्रवन्ति इति वा - नि० ११।१३] कम बोलनेवाले, परन्तु खूब कार्य करनेवाले, मनुष्य अपने उदाहरण से हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनाएँ। ३. (विराट् छन्दः) = हमारे अन्दर भी ('मरुतो विशः') = की भाँति अपने जीवनों को विशिष्ट रूप से दीप्त बनाने की कामना हो। यह जीवनों को दीप्त बनाने की कामना हमें ऊँचा उठाती है। हम अपनी शक्ति को भोगविलास में नष्ट नहीं होने देते और इस प्रकार हमारा जीवन उत्कृष्ट बनता है। ४. (धेनुः गौः न) = [नकारश्चार्थे - उ०] ज्ञान- दुग्ध का पान करानेवाली ज्ञानरश्मियाँ (इह) = इस मानव-जीवन में (इन्द्रियम्) = शक्ति को तथा (वयः) = उत्कृष्ट जीवन को हममें (दधुः) = धारण करें। सारी अवनति का मूल अज्ञान है, ज्ञान से ही जीवन उन्नत होता है।
Essence
भावार्थ - १. श्रद्धा, ज्ञान व पवित्र वाणी २. मितभाषी पुरुष ३. विशेषरूप से चमकने हमारे जीवन को उत्कृष्ट की प्रबल कामना तथा ४. ज्ञानदुग्ध को पिलानेवाली ज्ञानरश्मियाँ बनाएँ।
Subject
धेनुगौः