Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 11

61 Mantra
21/11
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- आत्रेय ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वाजे॑वाजेऽवत वाजिनो नो॒ धने॑षु विप्राऽअमृताऽऋतज्ञाः।अ॒स्य मध्वः॑ पिबत मा॒दय॑ध्वं तृ॒प्ता या॑त प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑॥११॥

वाज॑वाज॒ऽइति॑ वाजे॑ऽवाजे। अ॒व॒त॒। वा॒जि॒नः॒। नः॒। धने॑षु। वि॒प्राः॒। अ॒मृ॒ताः॒। ऋ॒त॒ज्ञा॒ऽइत्यृ॒॑तज्ञाः। अ॒स्य। मध्वः॑। पि॒ब॒त॒। मा॒दय॑ध्वम्। तृ॒प्ताः। या॒त॒। प॒थिभि॒रिति॑ प॒थिऽभिः॑। दे॒व॒यानै॒रिति॑ देव॒ऽयानैः॑ ॥११ ॥

Mantra without Swara
वाजेवाजेवत वाजिनो नो धनेषु विप्राऽअमृताऽऋतज्ञाः । अस्य मध्वः पिबत मादयध्वन्तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः ॥

वाजवाजऽइति वाजेऽवाजे। अवत। वाजिनः। नः। धनेषु। विप्राः। अमृताः। ऋतज्ञाऽइत्यृतज्ञाः। अस्य। मध्वः। पिबत। मादयध्वम्। तृप्ताः। यात। पथिभिरिति पथिऽभिः। देवयानैरिति देवऽयानैः॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के विद्वानों से ही प्रार्थना करते हैं कि (वाजिनः) = शक्तिशाली व ज्ञानी आप (न:) = हमारी (वाजे - वाजे) = प्रत्येक संग्राम में अवत- रक्षा करनेवाले होओ। आपकी कृपा से हम गतमन्त्र के 'अहि, वृक व राक्षसों' के साथ संग्राम में उनका हिंसन करनेवाले हों। २. हम भी आप की भाँति (धनेषु) = धनों के विषय में (विप्राः) = [वि + प्रा] विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले हों। हम धनों को सदा सुपथ से ही सञ्चित करनेवाले हों। ३. (अमृताः) = हम विषयों के पीछे मरनेवाले न हों, विषय हमारे लिए विषय बन्धनकारक [ षिञ् बन्धने] न रह जाएँ। ४. (ऋतज्ञा:) = हम अपने जीवनों में ऋत को जाननेवाले हों-हमारे जीवनों में मर्यादा हो, यज्ञ हों [ऋत-यज्ञ], अनृत से हम ऊपर उठे हुए हों। ५. इस प्रार्थना के करने पर विद्वान् उपदेश देते हैं कि ('अस्य मध्वः पिबत') इस मधु का पान करो। ओषधि - वनस्पतियों के सारभूत सोम [मधु] को तुम अपने जीवन में सुरक्षित करो। सोम का रक्षण तुम्हें (सोम) = परमात्मा - जैसा बनाएगा। ६. इस सोम का पान करके (मादयध्वम्) = हर्ष का अनुभव करो। तुम्हारा जीवन आह्लादमय बने । ७. (तृप्ताः यात) = तुम इस संसार में सदा तृप्त होकर चलो। भूखा व्यक्ति ही निष्करुण व पाप-प्रवृत्त होता है। ८. तुम (देवयानैः पथिभिः) = देवताओं से जाने योग्य मार्गों से चलनेवाले होओ। देवों के तुम अनुयायी बनो। देवों की भाँति ही तुम 'दान, दीपन व द्योतन' वाले होओ। वस्तुतः यही शान्ति प्राप्ति का मार्ग है।
Essence
भावार्थ- हम सोम की रक्षा करें, तृप्त व सन्तुष्ट होकर चलें। सदा प्रसन्न रहें। देवयान मार्ग पर आक्रमण करें। देवों के ही अनुगामी हों।
Subject
मार्गोपदेश