Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 1

61 Mantra
21/1
Devata- वरुणो देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒मं मे॑ वरुण श्रु॒धी हव॑म॒द्या च॑ मृडय। त्वाम॑व॒स्युरा च॑के॥१॥

इम॒म्। मे॒। व॒रु॒ण॒। श्रु॒धि। हव॑म्। अ॒द्य। च॒। मृ॒ड॒य॒। त्वाम्। अ॒व॒स्युः। आ। च॒के॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
इमम्मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्वामस्वस्युरा चके ॥

इमम्। मे। वरुण। श्रुधि। हवम्। अद्य। च। मृडय। त्वाम्। अवस्युः। आ। चके॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'शुनःशेप' ऋषि के ये मन्त्र हैं। सुख का [शुनं] निर्माण करनेवाला ऋषि प्रार्थना करता है कि हे (वरुण) = मेरे जीवन से सब द्वेषों का निवारण करनेवाले और मुझे श्रेष्ठ बनानेवाले प्रभो! [वरुण श्रेष्ठ] (मे) = मेरी (इमं हवम्) = इस पुकार को (श्रुधि) = सुनिए (च) = और (अद्य) = आज ही (मृडय) = सुखी कीजिए । २. (अवस्युः) = अपने रक्षण की कामनावाला मैं (त्वाम्) = आपकी (आचके) = [कामये] कामना करता हूँ, आपको चाहता हूँ। वस्तुतः रक्षण करनेवाले वे प्रभु ही हैं। जगज्जननी की गोद में ही यह जीव सुरक्षित रह पाता है।
Essence
भावार्थ- प्रभु वरुण हैं, मैं उन्हें पुकारता हूँ, वे मेरे जीवन को सुखी करते हैं। हम अपनी रक्षा करना चाहें तो उसका एकमात्र उपाय प्रभु-प्राप्ति की कामना है।
Subject
प्रभु की कामना