Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 85

90 Mantra
20/85
Devata- सरस्वती देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम्। य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती॥८५॥

चो॒द॒यि॒त्री। सू॒नृता॑नाम्। चेत॑न्ती। सु॒म॒ती॒नामिति॑ सुऽमती॒नाम्। य॒ज्ञम्। द॒धे॒। सर॑स्वती ॥८५ ॥

Mantra without Swara
चोदयित्री सूनृतानाञ्चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञन्दधे सरस्वती ॥

चोदयित्री। सूनृतानाम्। चेतन्ती। सुमतीनामिति सुऽमतीनाम्। यज्ञम्। दधे। सरस्वती॥८५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यह वेदवाणी (सूनृतानाम्) = [सु+ऊन् + ऋत] दुःखों का परिहाण करनेवाली तथा सत्य वाणियों की (चोदयित्री) = प्रेरणा देनवाली है, अर्थात् वेदवाणियों का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति ऐसी ही वाणी बोलता है जो सत्य होने के साथ औरों के दुःख को कम करनेवाली होती है तथा बड़ी मधुरता से बोली जाती है। संक्षेप में इसके बोलने का प्रकार 'सत्' होता है, सद्भाव से ही वह वचन बोला जाता है और वचन तो 'सत्' होता ही है । २. यह वेदवाणी (सुमतीनाम्) = उत्कृष्ट मतियों को (चेतन्ती) = चेतानेवाली है। इन ज्ञानवाणियों का अध्ययन करनेवाला कभी अशुभ तो सोचता ही नहीं। अध्ययनशून्य व्यक्ति दुर्मतियों का ही उत्पत्ति स्थान बन जाता है। 'नाश कैसे करना' इसी ओर उसका मस्तिष्क चलता है। स्वाध्याय सुमति का जनक होता है। ३. इस प्रकार यह (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता हमारे जीवनों में सुमतियों को चेताती हुई (यज्ञं दधे) = यज्ञ को धारण करती है, अर्थात् इस सरस्वती की आराधना की कृपा से हमारे सब कर्म यज्ञात्मक होते हैं। हमारे कर्मों में स्वार्थांश को प्रधानता नहीं मिलती।
Essence
भावार्थ- सरस्वती [क] हमारी वाणियों को सूनृत बनाती है, [ख] हमारे मनों व मस्तिष्कों में सुमति को जन्म देती है, [ग] हमारे जीवन को यज्ञरूप कर देती है।
Subject
सूनृता-सुमती