Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 80

90 Mantra
20/80
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒श्विना॒ तेज॑सा॒ चक्षुः॑ प्रा॒णेन॒ सर॑स्वती वी॒र्यम्।वा॒चेन्द्रो॒ बले॒नेन्द्रा॑य दधुरिन्द्रि॒यम्॥८०॥

अ॒श्विना॑। तेज॑सा। चक्षुः॑। प्रा॒णेन॑। सर॑स्वती। वी॒र्य᳖म्। वा॒चा। इन्द्रः॑। बले॑न। इन्द्रा॑य। द॒धुः॒। इ॒न्द्रि॒यम् ॥८० ॥

Mantra without Swara
अश्विना तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीर्यम् । वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम् ॥

अश्विना। तेजसा। चक्षुः। प्राणेन। सरस्वती। वीर्यम्। वाचा। इन्द्रः। बलेन। इन्द्राय। दधुः। इन्द्रियम्॥८०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. इस विदर्भि ऋषि के प्रकरण को समाप्त करते हुए कहते हैं कि घरों में यज्ञादि के ठीक होने पर तथा वैयक्तिक रूप से 'प्राणसाधना-स्वाध्याय व जितेन्द्रियता के अभ्यास' के चलने पर (अश्विना) = ये प्राणापान (तेजसा चक्षुः) = तेजस्विता के साथ चक्षु - इन्द्रिय की शक्ति को (दधुः) = धारण करते हैं। प्राणापान की साधना से तेजस्विता की वृद्धि होती है और चक्षु आदि इन्द्रियाँ ठीक कार्य करनेवाली बनती हैं। प्राणशक्ति की कमी होने पर आँख निर्बल हो जाती है और शरीर में अपान के कार्य के ठीक न होने पर आँख में मलिनता आ जाती है। एवं, आँख के ठीक रहने के लिए प्राणापान का कार्य ठीक रहना चाहिए। २. (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता प्राणेन प्राणशक्ति के साथ अथवा 'प्र+अन्' उत्कृष्ट जीवन के साथ (वीर्यम्) = वीर्य को (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए धारण करती है। 'स्वाध्याय' मनुष्य के जीवन को उत्कृष्ट तो बनाता ही है, उसे वीर्यसंयम के योग्य भी बनाता है चूँकि उसका वीर्य उसकी ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर शरीर में उत्तमता से उपयुक्त हो जाता है । ३. इसी स्वाध्यायशील तथा प्राणसाधना करनेवाले (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (वाचा) = वेदवाणी के साथ तथा (बलेन) = उस वेदज्ञान को क्रियारूप में लाने के लिए शक्ति के साथ (इन्द्रियम्) = प्रत्येक इन्द्रिय की शक्ति व धन को धारण करता है। ४. यहाँ 'इन्द्र-इन्द्राय', 'इन्द्र' इन्द्र के लिए धारण करता है। इस वाक्य में कर्तृपद परमात्म-वाचक और सम्प्रदानपद जीव के लिए है। एवं, जीव व ब्रह्म का द्वैत स्पष्ट है। यह प्रभु अपने सखा जीव के लिए 'वेदवाणी, शक्ति व धन' सभी वस्तुएँ प्राप्त कराता है, जिससे वह जीव उन्नत होकर उस जैसा बनने के लिए यत्नशील हो। यह जीव अपने में अधिकाधिक दिव्य गुणों का ग्रन्थन करनेवाला हो और अपने विदर्भि नाम को चरितार्थ करे । (ख)
Essence
भावार्थ - (क) प्राणापान की साधना हमें 'तेजस्विता व चक्षु' प्रदान करेगी, सरस्वती की आराधना से हमारा जीवन उत्कृष्ट वीर्यवान् होगा तथा (ग) प्रभु का उपासन हमें 'वेदवाणी, बल व जीवन यात्रा के लिए आवश्यक धन' प्राप्त कराएगा।
Subject
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