Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 7

90 Mantra
20/7
Devata- राजा देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृद गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
बा॒हू मे॒ बल॑मिन्द्रि॒यꣳ हस्तौ॑ मे॒ कर्म॑ वी॒र्यम्। आ॒त्मा क्ष॒त्रमुरो॒ मम॑॥७॥

बा॒हूऽइति॑ बा॒हू। मे॒। बल॑म्। इ॒न्द्रि॒यम्। हस्तौ॑। मे॒। कर्म॑। वी॒र्य᳖म्। आ॒त्मा। क्ष॒त्रम्। उरः॑। मम॑ ॥७ ॥

Mantra without Swara
बाहू मे बलमिन्द्रियँ हस्तौ मे कर्म वीर्यम् । आत्मा क्षत्रमुरो मम ॥

बाहूऽइति बाहू। मे। बलम्। इन्द्रियम्। हस्तौ। मे। कर्म। वीर्यम्। आत्मा। क्षत्रम्। उरः। मम॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (बलम्) = शरीर का बल तथा (इन्द्रियम्) = एक-एक इन्द्रिय की शक्ति ही (मे बाहू) = मेरी भुजाएँ हों, अर्थात् मैं बल और इन्द्रियों को भुजा के रूप में देखूं । २. (कर्म) = निरन्तर क्रियाशीलता और (वीर्यम्) = क्रियाशीलता से उत्पन्न वीर्य मे हस्तौ मेरे हाथ हों। ३. (मम) = मेरा (आत्मा) = आत्मिक बल तथा (क्षत्रम्) = क्षतों से बचानेवाला क्षात्रबल ही (उर:) = मेरी छाती व वक्षःस्थल हो ।
Essence
भावार्थ - राजा व्रत लेता है कि मैं [क] बल व इन्द्रिय-शक्ति को ही अपनी भुजाएँ समझँगा। [ख] कर्म व कर्मजनित शक्ति को हाथ समझँगा तथा [ग] आत्मिक बल व क्षात्रबल को ही उर: स्थनीय मानूँगा ।
Subject
बाहू+हस्तौ + उर: