Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 69

90 Mantra
20/69
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तमिन्द्रं॑ प॒शवः॒ सचा॒श्विनो॒भा सर॑स्वती।दधा॑ना अ॒भ्यनूषत ह॒विषा॑ य॒ज्ञऽइ॑न्द्रि॒यैः॥६९॥

तम्। इन्द्र॑म्। प॒श॑वः। सचा॑। अ॒श्विना॑। उ॒भा। सर॑स्वती। दधा॑नाः। अ॒भि। अ॒नू॒ष॒त॒। ह॒विषा॑। य॒ज्ञे। इ॒न्द्रि॒यैः ॥६९ ॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रम्पशवः सचाश्विनोभा सरस्वती । दधानाऽअभ्यनूषत हविषा यज्ञ इन्द्रियैः ॥

तम्। इन्द्रम्। पशवः। सचा। अश्विना। उभा। सरस्वती। दधानाः। अभि। अनूषत। हविषा। यज्ञे। इन्द्रियैः॥६९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के ‘यं इन्द्रम्' शब्द का प्रस्तुत मन्त्र में 'तं इन्द्रम्' से उल्लेख करते हैं। (तम् इन्द्रम्) = उस इन्द्र को (पशवः) = काम-क्रोध आदि पशु (उभा अश्विना) = दोनों प्राणापान तथा (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता - ये सब (सचा) = मिलकर (दधानाः) = धारण करते हुए (यज्ञे) = इस जीवनयज्ञ में हविषा त्यागपूर्वक अदन की वृत्ति से तथा (इन्द्रियैः) = [वीर्यैः] इन्द्रियशक्तियों से (अभ्यनूषत) = बढ़ाते हैं [नूषतिर्वृद्ध्यर्थम्] अथवा स्तुत करते हैं [नू स्तवने ] । २. 'काम' शत्रु है, परन्तु यही नियन्त्रित हुआ हुआ पुरुषार्थ हो जाता है। इसी प्रकार 'क्रोध' शत्रु है परन्तु वही क्रोध विचारपूर्वक होने पर मन्यु होता है और वाञ्छनीय हो जाता है। ये काम व मन्यु जीवन में उन्नति के लिए सहायक होते हैं, इसीलिए मनु ने लिखा है कि ('न चैवेहास्त्यकामता') = अकामता के लिए इस जीवन में कोई स्थान नहीं है। सब ज्ञान व यज्ञ काम से ही हुआ करते हैं। प्राणायाम इन्द्रियदोषों को दूर करता है। स्वाध्याय बुद्धि का शोधन करता है। ३. इस प्रकार ये पशु, प्राणापान व ज्ञान मनुष्य का धारण करते हुए उसका वर्धन करते हैं, उसके जीवन में हवि होती है, उसकी इन्द्रियाँ शक्तिसम्पन्न बनती हैं।
Essence
भावार्थ - हवि व इन्द्रिय-शक्तियों से हमारा जीवन स्तुत्य बने ।
Subject
पशवः-अश्विना-सरस्वती