Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 66

90 Mantra
20/66
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
गोभि॒र्न सोम॑मश्विना॒ मास॑रेण परि॒स्रुता॑।सम॑धात॒ꣳ सर॑स्वत्या॒ स्वाहेन्द्रे॑ सु॒तं मधु॑॥६६॥

गोभिः॑। न। सोम॑म्। अ॒श्वि॒ना॒। मास॑रेण। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। सम्। अ॒धा॒त॒म्। सर॑स्वत्या। स्वाहा॑। इन्द्रे॑। सु॒तम्। मधु॑ ॥६६ ॥

Mantra without Swara
गोभिर्न सोममश्विना मासरेण परिस्रुता । समधातँ सरस्वत्या स्वाहेन्द्रे सुतम्मधु ॥

गोभिः। न। सोमम्। अश्विना। मासरेण। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। सम्। अधातम्। सरस्वत्या। स्वाहा। इन्द्रे। सुतम्। मधु॥६६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अश्विना) प्राणापान (गोभिः न) = [नश्चार्थे - म० ] ज्ञानेन्द्रियों के साथ अथवा ज्ञान की वाणियों के साथ (सोमम्) = सोम को (समधातम्) = धारण करते हैं । २. (परिस्रुता) = सोम के परितः स्रवण व व्यापन के साथ (मासरेण) = [मासेषु रमण] प्रत्येक मास में रमण के साथ सोम को धारण करते हैं, अर्थात् शरीर में सोम का व्यापन होने पर सारे महीने व सारी ऋतुएँ अच्छी-ही-अच्छी लगती हैं। ३. (सरस्वत्या) = ज्ञानाधिदेवता के साथ (स्वाहा) = स्वार्थत्याग की भावना (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (सुतम्) = सोम को तथा (मधु) = माधुर्य को धारण करती है। ४. यदि हम चाहते हैं कि [क] हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक बनी रहें, हमें ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त हों [गोभि:], [ख] हमें सब मास अच्छे ही अच्छे लगे [ मासरेण], [ग] हमारी सब क्रियाएँ माधुर्य को लिये हुए हों [मधु] तो आवश्यक है कि हम प्राणापान की साधना करें [अश्विना], स्वाध्यायशील हों [सरस्वती], हममें स्वार्थत्याग की भावना हो [ स्वाहा ] ।
Essence
भावार्थ- हम सोमरक्षा द्वारा अपने जीवन को ज्ञानसम्पन्न, प्रसन्नता से युक्त मनवाला तथा माधुर्यमय बनाएँ।
Subject
सुतं मधु