Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 65

90 Mantra
20/65
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋ॒तु॒थेन्द्रो॒ वन॒स्पतिः॑ शशमा॒नः प॑रि॒स्रुता॑।की॒लाल॑म॒श्विम्यां॒ मधु॑ दु॒हे धे॒नुः सर॑स्वती॥६५॥

ऋ॒तु॒थेत्यृ॑तु॒ऽथा। इन्द्रः॑। वन॒स्पतिः॑। श॒श॒मा॒नः। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। की॒लाल॑म्। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। मधु॑। दु॒हे। धे॒नुः। सर॑स्वती ॥६५ ॥

Mantra without Swara
ऋतुथेन्द्रो वनस्पतिः शशमानः परिस्रुता । कीलालमश्विभ्याम्मधु दुहे धेनुः सरस्वती ॥

ऋतुथेत्यृतुऽथा। इन्द्रः। वनस्पतिः। शशमानः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। कीलालम्। अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। मधु। दुहे। धेनुः। सरस्वती॥६५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'पिछले मन्त्र के अनुसार अपने में सोम का उत्पादन करनेवाला इन्द्र कैसा बनता हैं', इस बात का प्रतिपादन प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार करते हैं- (ऋतुथा) = वह ऋतु के अनुसार चलता है, ऋतु के अनुकूल अपना आहार-विहार रखता है। २. (इन्द्रः) - इन्द्रियों का अधिष्ठाता व जितेन्द्रिय बनता है। ३. (वनस्पतिः) = ज्ञान की रश्मियों का पति बनता है। ४, (शशमान:) = तीव्र गतिवाला होता है, किसी कर्म में आलस्य नहीं करता और ५. इसके जीवन में (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता (अश्विभ्याम्) = प्राणापान के साथ (परिस्त्रुता) = शरीर में सोम के (परितः स्रवण) = [व्यापन] के द्वारा (कीलालम्) = बन्धन को, उस परमात्मा के साथ सम्बन्ध को तथा (मधु) = माधुर्य को (दुहे) = प्रपूरित करती है। इस प्रकार इसके लिए यह सरस्वती (धेनुः) = आप्यायन करनेवाली होती है। इसकी सब शक्तियों के वर्धन का कारण बनती है। ६. इन्द्र वह है जो समयानुसार कार्य करता है, ज्ञानरश्मियोंवाला होता है तथा द्रुत गतिवाला होता है, कार्यों में कभी आलस्य नहीं करता। ७. प्राणापान की साधना तथा स्वाध्याय इसे व्रतों के बन्धन में बाँधकर प्रभु के मार्ग पर ले चलते हैं। इसके जीवन में माधुर्य का कारण बनते हैं। सरस्वती की आराधना इसके आप्यायन का कारण बनती है। ८. ऊपर की सब बातें तभी हैं जब सोम का शरीर में ही परितः स्रवण व व्यापन हो ।
Essence
भावार्थ- सोमी ऋतु के अनुसार आचरण करता है, जितेन्द्रिय बनता है, ज्ञानी व तीव्र गतिवाला होता है, प्राणापान की साधना से परमात्मा के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ता है।
Subject
इन्द्रः