Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 63

90 Mantra
20/63
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ति॒स्रस्त्रे॒धा सर॑स्वत्य॒श्विना॒ भार॒तीडा॑।ती॒व्रं प॑रि॒स्रुता॒ सोम॒मिन्द्रा॑य सुषुवु॒र्मद॑म्॥६३॥

ति॒स्रः। त्रे॒धा। सर॑स्वती। अ॒श्विना॑। भार॑ती। इडा॑। ती॒व्रम्। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। सोम॑म्। इन्द्रा॑य। सु॒षु॒वुः॒। सु॒सु॒वु॒रिति॑ सुसुवुः। मद॑म् ॥६३ ॥

Mantra without Swara
तिस्रस्त्रेधा सरस्वत्यश्विना भारतीडा । तीव्रम्परिस्रुता सोममिन्द्राय सुषुवुर्मदम् ॥

तिस्रः। त्रेधा। सरस्वती। अश्विना। भारती। इडा। तीव्रम्। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। सोमम्। इन्द्राय। सुषुवुः। सुसुवुरिति सुसुवुः। मदम्॥६३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (तिस्रः) = तीनों सरस्वती ज्ञान की अधिदेवता, भारती वाणी तथा (इडा) = श्रद्धा (त्रेधा) = जो तीन प्रकार से अवस्थित हैं, 'सरस्वती' द्युलोक में, 'इडा' [श्रद्धा] अन्तरिक्षलोक में तथा 'भारती' इस पृथिवीलोक में, इन तीन देवियों के साथ (अश्विना) = प्राणापान (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (परिस्रुता) = [परिता स्रवणेन ] शरीर में व्यापन के द्वारा (तीव्रम्) = बुद्धि की तीव्रता के सम्पादन करनेवाले [पटुत्वकरम् - उ० ] तथा (मदम्) = हृदयान्तरिक्ष में उल्लास को पैदा करनेवाले (सोमम्) = सोम को, वीर्यशक्ति को (सुषुवुः) = पैदा करते हैं। २. अन्न के सेवन से शरीर में रसादि के क्रम से सोम की उत्पत्ति होती है। यह सोम शरीर में ही व्याप्त रहे, शरीर का ही अङ्ग बन जाए, इसके लिए आवश्यक है कि हम [ क ] स्वाध्याय की वृत्ति को अपनाएँ, सरस्वती की आराधना करें, [ख] प्राणापान की साधना करें, प्राणायाम के अभ्यासी हों [अश्विना], [ग] वाणी को नियन्त्रित रक्खें। यह औरों का भरण-पोषण करनेवाली हो, उत्साहवर्धक, प्रशंसात्मक शब्द ही बोले । कभी क्रोधभरे शब्द न निकाले । ब्रह्मचारी के लिए क्रोध वर्जित है, [घ] हम श्रद्धायुक्त मनवाले हों। हमारा श्रद्धासम्पन्न हृदय सदा प्रभु का स्मरण करनेवाला हो। वह वासनाओं का क्षेत्र न बने । ३. इस प्रकार 'स्वाध्याय, प्राणसाधना, क्रोधशून्य मधुर वाणी व श्रद्धा' इन साधनों से सोम के शरीर में ही व्याप्त होने पर मनुष्य [क] तीव्र बुद्धि बनता है [तीव्रम्], [ख] उसका जीवन उल्लासमय होता है [मदम् ], [ग] इन दो लाभों के अतिरिक्त उसका शरीर भी बड़ा स्वस्थ बनता है। इसी स्वास्थ्य के वर्णन से अग्रिम मन्त्र का प्रारम्भ होगा।
Essence
भावार्थ- सोम मनुष्य को तीव्र बुद्धि व उल्लासमय जीवनवाला बनाता है। 'यह शरीर में ही सुरक्षित रहे', इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वाध्यायशील हों, प्राणापान के अभ्यासी हों, वही वाणी बोलें जो क्रोधशून्य हो तथा हृदय में श्रद्धा की भावना से ओत-प्रोत हों।
Subject
तीव्रम् मदम्