Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 60

90 Mantra
20/60
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
क॒व॒ष्यो न व्यच॑स्वतीर॒श्विभ्यां॒ न दुरो॒ दिशः॑।इन्द्रो॒ न रोद॑सीऽउ॒भे दु॒हे कामा॒न्त्सर॑स्वती॥६०॥

क॒व॒ष्यः᳕। न। व्यच॑स्वतीः। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। न। दुरः॑। दिशः॑। इन्द्रः॑। न। रोद॑सी॒ऽइति॒ रोद॑सी। उ॒भेऽइत्यु॒भे। दु॒हे। कामा॑न्। सर॑स्वती ॥६० ॥

Mantra without Swara
कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यान्न दुरो दिशः । इन्द्रो न रोदसी उभे दुहे कामान्त्सरस्वती॥

कवष्यः। न। व्यचस्वतीः। अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। न। दुरः। दिशः। इन्द्रः। न। रोदसीऽइति रोदसी। उभेऽइत्युभे। दुहे। कामान्। सरस्वती॥६०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अश्विभ्याम्) = प्राणापान के द्वारा, अर्थात् प्राणापान की साधना से (दुर:) = शरीर के 'मुख+पायुः+ उपस्थ+ ब्रह्मरन्ध्र 'रूपी चारों द्वार (कवष्य:) = [ कूयन्ते स्तूयन्ते] बड़े स्तुत्य हों। 'कवष्यः' शब्द का अर्थ ढाल भी है। ये द्वार मनुष्य के लिए ढाल का काम करें। उसे शत्रुओं के आक्रमण से बचानेवाले हों। मुख व पायु के ठीक कार्य करने पर मनुष्य रोगों से बचा रहता है, उपस्थ व ब्रह्मरन्ध्र के ठीक कार्य करने पर मनुष्य अध्यात्म दृष्टि से उन्नत होता है और वासनाओं का शिकार नहीं होता। २. (न) = और ये द्वार [ समुच्चयार्थीयो नकार :- उ० ] (व्यचस्वती:) = [व्याप्तिमत्यः- द०] व्याप्ति व विस्तारवाले हों। ये अपने-अपने कार्य को करने की विस्तृत शक्तिवाले हों। ३. (न) = और ये द्वार (दिश:) = [दिश् to direct ] जीवन को बड़ा सुव्यवस्थित करनेवाले हों। ४. (न) = और इन उत्तम द्वारोंवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (रोदसी) = दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक का मस्तिष्क व शरीर का (दुहे) = प्रपूरण करे। इनकी कमियों को दूर करके इनमें क्रमशः ज्ञान व शक्ति को भरे तथा ५. (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता (कामान् दुहे) = सब इष्ट कामनाओं को पूरण करे। ज्ञान से हमारी कामनाएँ पवित्र तो हों ही, उन कामनाओं का हम पूरण भी कर सकें।
Essence
भावार्थ- 'मुख-पायु - उपस्थ व ब्रह्मरन्ध्र 'रूपी चारों द्वारा स्तुत्य व विस्तारवाले हों। ये हमारे जीवनों को बड़ा व्यवस्थित करनेवाले हों। हम शरीर व मस्तिष्क दोनों का उचित पूरण करें तथा ज्ञान द्वारा सब इष्ट कामनाओं को सिद्ध करें।
Subject
विस्तृत द्वार