Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 56

90 Mantra
20/56
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त॒नू॒पा भि॒षजा॑ सु॒तेऽश्विनो॒भा सर॑स्वती।मध्वा॒ रजा॑सीन्द्रि॒यमिन्द्रा॑य प॒थिभि॑र्वहान्॥५६॥

त॒नू॒पेति॑ तनू॒ऽपा। भि॒षजा॑। सु॒ते। अ॒श्विना॑। उ॒भा। सर॑स्वती। मध्वा॑। रजा॑सि। इ॒न्द्रि॒यम्। इन्द्रा॑य। प॒थिभि॒रिति॑ प॒थिऽभिः॑। व॒हा॒न् ॥५६ ॥

Mantra without Swara
तनूपा भिषजा सुते स्विनोभा सरस्वती । अध्वा रजाँँसीन्द्रियमिन्द्राय पथिभिर्वहान् ॥

तनूपेति तनूऽपा। भिषजा। सुते। अश्विना। उभा। सरस्वती। मध्वा। रजासि। इन्द्रियम्। इन्द्राय। पथिभिरिति पथिऽभिः। वहान्॥५६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के 'विदर्भि' के जीवन में (सुते) = सोम के उत्पन्न होने पर (उभा अश्विना) = दोनों प्राणापान (तनूपा) = शरीर की रक्षा करनेवाले होते हैं और (भिषजा) = वे सब रोगों की चिकित्सा करनेवाले होते हैं। इनके शरीर में प्रथम तो रोग उत्पन्न ही नहीं होते, उत्पन्न हो भी जाते हैं तो शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। उत्पन्न हुए हुए सोम को प्राणापान शरीर में व्याप्त करते हैं और इस प्रकार उस उस अङ्ग को सबल बनाकर उसे रोगों का घर नहीं बनने देते । २. इसके जीवन में सरस्वती विद्या की अधिदेवता, अर्थात् ज्ञान (मध्वा) = माधुर्य के साथ (रजांसि) = ' रजः कर्मणि भारत', 'रजरुवर्थ उच्यते' कर्मों को व अर्थों को धारण करता है। यह प्राणसाधन द्वारा सुरक्षित सोमवाला पुरुष ज्ञानाग्नि के दीप्त होने पर [क] 'बड़े माधुर्यपूर्ण व्यवहारवाला' होता है। [ख] सदा उत्तम कर्मों में लगा रहता है। [ग] इन उत्तम कर्मों के द्वारा यह अर्थ का उपार्जन करनेवाला बनता है। ३. इस प्रकार ये प्राणापान तथा ज्ञान [ क्षत्र + ब्रह्म] (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (पथिभिः) = उत्तम मार्गों से (इन्द्रियम्) = प्रत्येक इन्द्रिय की शक्ति को तथा धन को [इन्द्रियं धनम् ] (वहान्) = प्राप्त कराते हैं। गो० ३।२।२ । में इन धनों का उल्लेख इस रूप में है- 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः सप्तेन्द्रियाण्यभि जायते ब्रह्मवर्चसं यशश्च स्वप्नं च क्रोधं च श्लाघां च रूपं च पुण्यगन्धं सप्तमम्', अर्थात् प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि विदर्भि के जीवन में ब्रह्मवर्चस होता है, वह यशस्वी बनता है, चिन्ता से ऊपर उठे होने से वह ठीक से सोता है, पाप के प्रति वह क्रोध कर पाता है, लोगों की दृष्टि में वह सदा श्लाघा के योग्य जीवनवाला होता है, सुन्दर रूपवाला होता है और उत्तम ज्ञानवाला होता है।
Essence
भावार्थ - एक आदर्श जीवनवाले पुरुष के शरीर में प्राणापान होते हैं और विद्याभ्यास से बढ़ा हुआ ज्ञान उसे मधुर व शक्तिसम्पन्न बनाता है। यह सुमार्ग से उत्तम धनों का अर्जन करता है।
Subject
अश्विना-सरस्वती