Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 54

90 Mantra
20/54
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वेदिन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुं॒ वसि॑ष्ठासोऽअ॒भ्यर्चन्त्य॒र्कैः। स नः॑ स्तु॒तो वी॒रव॑द्धातु॒ गोम॑द् यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥५४॥

ए॒व। इत्। इन्द्र॑म्। वृष॑णम्। वज्र॑बाहु॒मिति॒ वज्र॑ऽबाहुम्। वसि॑ष्ठासः। अ॒भि। अ॒र्च॒न्ति॒। अ॒र्कैः। सः। नः॒। स्तु॒तः। वी॒रव॒दिति॑ वी॒रऽव॑त्। धा॒तु॒। गोम॒दिति॒ गोऽम॑त्। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिभि॒रिति॑ स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥५४ ॥

Mantra without Swara
एवेदिन्द्रँवृषणँवज्रबाहुँवसिष्ठासोऽअभ्यर्चन्त्यर्कैः । स न स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयम्पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

एव। इत्। इन्द्रम्। वृषणम्। वज्रबाहुमिति वज्रऽबाहुम्। वसिष्ठासः। अभि। अर्चन्ति। अर्कैः। सः। नः। स्तुतः। वीरवदिति वीरऽवत्। धातु। गोमदिति गोऽमत्। यूयम्। पात। स्वस्तिभिरिति स्वस्तिऽभिः। सदा। नः॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एव इत्) = गतमन्त्रों के अनुसार निश्चय से (इन्द्रम्) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले (वृषणम्) = प्रजा पर सुखों की वर्षा करनेवाले शक्तिशाली वज्रबाहुम् - प्रजा की रक्षा के लिए हाथ में वज्र लिये हुए अथवा क्रियाशील राजा को (वसिष्ठासः) = राष्ट्र में उत्तम निवासवाले प्रजाजन (अर्कैः) = स्तोत्रों से (अभ्यर्चन्ति) = पूजते हैं, सत्कृत करते हैं। 'अर्क' शब्द का अर्थ 'अन्न' भी है। अपने धान्यों में से छठा या ८वाँ भाग देकर राजा का उचित मान करते हैं। स्पष्ट है कि राजा का कर्त्तव्य जहाँ प्रजा की रक्षा करना है, वहाँ सुरक्षित प्रजाओं का भी यह कर्त्तव्य है कि राजा को अपने धान्यों का निश्चित अंश कररूप में अवश्य दे। २. इस प्रकार प्रजा से (स्तुतः) = स्तुति किया हुआ (सः) = वह राजा (न:) = हमारे लिए (वीरवत्) = उत्तम वीरोंवाले तथा (गोमत्) = प्रशस्त गौवोंवाले राष्ट्र का (धातु) = धारण करे, अर्थात् राजा राष्ट्र की ऐसी व्यवस्था करे कि राष्ट्र में सब पुरुष वीर हों। रोगादि के कारण व अन्नाभाव के कारण राष्ट्र में लोग क्षीणशक्ति न हो जाएँ। इसी दृष्टिकोण से राजा यह व्यवस्था भी करे कि राष्ट्र में गौवें खूब हों। प्रत्येक घर में गौ के लिए स्थान हो । वैदिक आदर्श के अनुसार आदर्श घर वही है जहाँ ('आ धेनवः सायमास्पन्दमाना:') = सायंकाल कूदती - फाँदती गौवें आती हैं। गौवें होंगी तो हमारी सन्तानें भी वीर होंगी। एवं एक-एक घर 'गोमत्-वीरवत्' बनेगा और सारा राष्ट्र बड़ा सुन्दर हो जाएगा। इस सुन्दर राष्ट्र में उत्तम निवासवाले ये व्यक्ति ' वसिष्ठ' होंगे। ३. ये वसिष्ठ राजा [इन्द्र] के मन्त्री आदि कर्मचारी वर्ग [देवों] को कहते हैं कि (यूयम्) = तुम सब (स्वस्तिभिः) = उत्तम स्थितियों के द्वारा (नः) = हमारी पात रक्षा करो। सब मन्त्रिवर्ग राष्ट्र का कार्य इस उत्तमता से करें कि प्रजा के सब लोगों की स्थिति उत्तम हो ।
Essence
भावार्थ - राजा प्रजा की रक्षा करे। प्रजा राजा को अन्नभाग दे। प्रशंसित राजा हमारे राष्ट्र को वीरोंवाला तथा गौवोंवाला बनाये। सब मन्त्री आदि राष्ट्र की स्थिति को उत्तम बनाने का ध्यान करें।
Subject
वीरवत् गोमत्