Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 5

90 Mantra
20/5
Devata- सभापतिर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
शिरो॑ मे॒ श्रीर्यशो॒ मुखं॒ त्विषिः॒ केशा॑श्च॒ श्मश्रू॑णि। राजा॑ मे प्रा॒णोऽअ॒मृत॑ꣳ स॒म्राट् चक्षु॑र्वि॒राट् श्रोत्र॑म्॥५॥

शिरः॑। मे॒। श्रीः। यशः॑। मुख॑म्। त्विषिः॑। केशाः॑। च॒। श्मश्रू॑णि। राजा॑। मे॒। प्रा॒णः। अ॒मृत॑म्। स॒म्राडिति॑ स॒म्ऽराट्। चक्षुः॑। वि॒राडिति॑ वि॒ऽराट्। श्रोत्र॑म् ॥५ ॥

Mantra without Swara
शिरो मे श्रीर्यशो मुखन्त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि । राजा मे प्राणो अमृतँ सम्राट्चक्षुर्विराट्श्रोत्रम् ॥

शिरः। मे। श्रीः। यशः। मुखम्। त्विषिः। केशाः। च। श्मश्रूणि। राजा। मे। प्राणः। अमृतम्। सम्राडिति सम्ऽराट्। चक्षुः। विराडिति विऽराट्। श्रोत्रम्॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अभिषिक्त राजा उपस्थित प्रजाजन को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि मैं प्रयत्न करूँगा कि (मे शिरः) = मेरा मस्तिष्क (श्रीः) = सदा ' श्रीसम्पन्न हो, उसमें सदा उत्तम विचारों को ही स्थान मिले। २. (मुखं यश:) = मेरा मुख यशस्वी हो, अर्थात् मेरे मुख से किसी प्रकार के अशुभ शब्दों का उच्चारण न हो। ३. (श्मश्रूणि) = [श्मनि श्रितम् ] शरीर में आश्रित 'इन्द्रियाँ - मन व बुद्धि' ये सब (त्विषि:) = दीप्ति के पुञ्ज हों (च) और (केशाः) = ज्ञान की रश्मियों से युक्त हों। ये सब अपने-अपने कार्य को करने में समर्थ होकर चमकें । ये सब = ज्ञान की किरणों से दीप्त हों। ४. (मे प्राण:) = मेरी प्राणशक्ति (राजा) = मेरे जीवन को दीप्त करनेवाली हो [ राजू दीप्तौ ] तथा यह मेरे जीवन को बड़ा व्यवस्थित बनाए। साथ ही यह प्राणशक्ति (अमृतम्) = मुझे रोगों से मरने न दें। मुझे नीरोग बनाकर पूर्ण शतमान आयुवाला बनाए । ५. (चक्षुः) = मेरी आँख सम्राट् सम्यक् प्रकाशमान हो । मानस स्वास्थ्य के कारण मेरी आँख में नैर्मल्य की चमक हो । ६. (श्रोत्रम्) = मेरा कान, वेदज्ञान को श्रवण करने के कारण, (विराट्) = विशिष्ट रूप से शोभायमान हो। आचार्य दयानन्द के शब्दों में यह विविध शास्त्र श्रवणयुक्त हो और इसीलिए यह (विराट्) = चमकनेवाला हो।
Essence
भावार्थ - राजा के व्रत हैं- [क] मैं मस्तिष्क में पवित्र विचारों को धारण करूँगा, [ख] मेरा मुख यशस्वी शब्दोंवाला हो, [ग] मेरी इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि सब-के-सब दीप्त व ज्ञान की रश्मियोंवाले हों, [घ] प्राण मेरी दीप्ति व अमरता का कारण हो, [ङ] चक्षु सम्राट् हो और [च] कान विराट् हो ऐसा मैं प्रयत्न करूँगा। ।
Subject
व्रत-धारण