Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 48

90 Mantra
20/48
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ न॒ऽइन्द्रो॑ दू॒रादा न॑ऽआ॒साद॑भिष्टि॒कृदव॑से यासदु॒ग्रः। ओजि॑ष्ठेभिर्नृ॒पति॒र्वज्र॑बाहुः स॒ङ्गे स॒मत्सु॑ तु॒र्वणिः॑ पृत॒न्यून्॥४८॥

आ। नः॒। इन्द्रः॑। दू॒रात्। आ। नः॒। आ॒सात्। अ॒भि॒ष्टि॒कृदित्य॑भिष्टि॒ऽकृत्। अव॑से। या॒स॒त्। उ॒ग्रः। ओजि॑ष्ठेभिः। नृ॒पति॒रिति॑ नृ॒ऽपतिः॑। वज्र॑बाहु॒रिति॒ वज्र॑ऽबाहुः। स॒ङ्ग इति॑ स॒म्ऽगे। स॒मत्स्विति॑ स॒मत्ऽसु॑। तु॒र्वणिः॑। पृ॒त॒न्यून् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
आ नऽइन्द्रो दूरादा न आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः । ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून् ॥

आ। नः। इन्द्रः। दूरात्। आ। नः। आसात्। अभिष्टिकृदित्यभिष्टिऽकृत्। अवसे। यासत्। उग्रः। ओजिष्ठेभिः। नृपतिरिति नृऽपतिः। वज्रबाहुरिति वज्रऽबाहुः। सङ्ग इति सम्ऽगे। समत्स्विति समत्ऽसु। तुर्वणिः। पृतन्यून्॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के राजा के लिए ही कहते हैं कि यह (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला राजा (नः) = हमें (दूरात्) = दूर से और (नः) = हमें (आसात्) = समीप से भी (आयासत्) = आये 'दूर हो, समीप हो' कहीं भी हो, हमारी अवसे रक्षा के लिए यह आये ही । २. यह स्वयं राष्ट्र में उस-उस स्थान पर पहुँचकर (अभिष्टिकृत्) = अभिलषित कार्यों का करनेवाला हो । यह राजा उचित प्रबन्ध के द्वारा वाञ्छनीय वस्तुओं को प्राप्त कराने की व्यवस्था करे तथा आवश्यक प्रबन्ध के द्वारा सब प्रजाओं का रक्षण करनेवाला हो। ३. शत्रु का आक्रमण होने पर (ओजिष्ठेभिः) = ओजस्वितम, अत्यन्त बलिष्ठ सेनाओं से युक्त हुआ हुआ, गतमन्त्र की 'पूर्वी तविषी 'प्रथम श्रेणी की सर्वोत्तम सेनाओं से युक्त हुआ हुआ (नृपतिः) = प्रजाओं का रक्षक राजा (वज्रबाहुः) = वज्रयुक्त भुजावाला होकर स-शत्रु के साथ मेल होने पर, अर्थात् युद्ध में (समत्सु) = आक्रमणों के होने पर (पृतन्यून्) = शत्रुओं को [पृतनामिच्छन्ति] (तुर्वणि:) = [तुर्वति] नष्ट करनेवाला होता है। शत्रुओं का नाश करके यह प्रजा को शत्रु के आक्रमण भय से मुक्त करता है। भयमुक्त प्रजा ही तो विविध क्षेत्रों में उन्नति कर सकती है।
Essence
भावार्थ- राजा दूर हो या समीप हो, प्रजा के रक्षण के लिए उस उस स्थान पर पहुँचे। प्रजा की अभिलाषाओं को सिद्ध करनेवाला हो। शत्रुओं का आक्रमण होने पर शक्तिशाली सैन्यों के साथ स्वयं अस्त्र-शस्त्र धारण करके शत्रु का संहार करे।
Subject
युद्ध व आक्रमण