Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 47

90 Mantra
20/47
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आया॒त्विन्द्रोऽव॑स॒ऽउप॑ नऽइ॒ह स्तु॒तः स॑ध॒माद॑स्तु॒ शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नस्तवि॑षी॒र्यस्य॑ पू॒र्वीर्द्यौर्न क्ष॒त्रम॒भिभू॑ति॒ पुष्या॑त्॥४७॥

आ। या॒तु॒। इन्द्रः॑। अव॑से। उप॑। नः॒। इ॒ह। स्तु॒तः। स॒ध॒मादिति॑ सध॒ऽमात्। अ॒स्तु॒। शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नः। व॒वृ॒धा॒नऽइति॑ ववृधा॒नः। तवि॑षीः। यस्य॑। पू॒र्वीः। द्यौः। न। क्ष॒त्रम्। अ॒भिभूतीत्य॒भिऽभू॑ति। पुष्या॑त् ॥४७ ॥

Mantra without Swara
आयात्विन्द्रो वसऽउप नऽइह स्तुतः सधमादस्तु शूरः । वावृधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीर्द्यार्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात् ॥

आ। यातु। इन्द्रः। अवसे। उप। नः। इह। स्तुतः। सधमादिति सधऽमात्। अस्तु। शूरः। वावृधानः। ववृधानऽइति ववृधानः। तविषीः। यस्य। पूर्वीः। द्यौः। न। क्षत्रम्। अभिभूतीत्यभिऽभूति। पुष्यात्॥४७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का प्रजारक्षक, ब्रह्मचर्य व्रत का पालक (इन्द्रः) = राजा (इह) = इस राष्ट्र में (नः उप) = हमारे समीप अवसे रक्षण के लिए (आयातु) = आये । २. अपने उत्तम जीवन व कर्म के कारण (स्तुतः) = स्तुति किया हुआ, जिसकी सब प्रशंसा करते हैं', ऐसा यह राजा (शूरः) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाला तथा (सधमात्) = [देवैः सार्धं मादयति] देवतुल्य अपने मन्त्रियों के साथ प्रजा को आनन्दित करनेवाला अस्तु हो । यह वस्तुतः प्रजारक्षण के कार्य में ही आनन्द का अनुभव करे, प्रजाओं के साथ मिलनेवाला हो, प्रजाओं के लिए अपने आराम को तिलाञ्जलि देनेवाला हो, उनके लिए अभिगम्य हो । ३. (वावृधानः) = इस प्रकार यह राष्ट्र का निरन्तर वर्धन करनेवाला हो। ४. यह राजा वह हो (यस्य) = जिसकी (तविषी:) = सेनाएँ व बल (पूर्वी:) = प्रथम श्रेणी की हैं, अर्थात् अत्यन्त उत्तम हैं । ५. यह राजा (द्यौः न) = प्रकाश की भाँति (अभिभूति क्षत्रम्) = शत्रुओं के पराभव करनेवाले बल का (पुष्यात्) = पोषण करे। उस शक्ति से सम्पन्न हो जो शक्ति शत्रुओं का पराभव करने में समर्थ हो । जहाँ इसमें ज्ञान हो, वहाँ इसमें अद्भुत बल भी हो।
Essence
भावार्थ- प्रजा का रक्षण करनेवाला यह राजा अपने उत्तम कार्यों से प्रजा से स्तुत हो, शूर हो, वृद्धिशील हो, इसकी सेनाएँ भी प्रथम श्रेणी की, अर्थात् उत्तम शिक्षित हों। जहाँ यह ज्ञान के प्रकाशवाला हो, वहाँ शत्रु पराजयक्षम बल से भी सम्पन्न हो। इस प्रकार स्वयं सुन्दर दिव्य गुणोंवाला 'वामदेव' बनकर यह प्रजाओं को भी 'वामदेव' बनाने के लिए प्रयत्नशील होता है [वाम सुन्दर, देव- दिव्य गुण] ।
Subject
अभिभूति क्षत्रम्