Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 46

90 Mantra
20/46
Devata- स्वाहाकृतयो देवताः Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्तो॒काना॒मिन्दुं॒ प्रति॒ शूर॒ऽइन्द्रो॑ वृषा॒यमा॑णो वृष॒भस्तु॑रा॒षाट्। घृ॒त॒प्रुषा॒ मन॑सा॒ मोद॑मानाः॒ स्वाहा॑ दे॒वाऽअ॒मृता॑ मादयन्ताम्॥४६॥

स्तो॒काना॑म्। इन्दु॑म्। प्रति॑। शूरः॑। इन्द्रः॑। वृ॒षा॒यमा॑णः। वृष॒यमा॑ण॒ इति॑ वृष॒यऽमा॑णः। वृ॒ष॒भः। तु॒रा॒षाट्। घृ॒त॒प्रुषेति॑ घृत॒ऽप्रुषा॑। मन॑सा। मोद॑मानाः। स्वाहा॑। दे॒वाः। अ॒मृताः॑। मा॒द॒य॒न्ता॒म् ॥४६ ॥

Mantra without Swara
स्तोकानामिन्दुम्प्रति शूरऽइन्द्रो वृषायमाणो वृषभस्तुराषाट् । घृतप्रुषा मनसा मोदमानाः स्वाहा देवाऽअमृता मादयन्ताम् ॥

स्तोकानाम्। इन्दुम्। प्रति। शूरः। इन्द्रः। वृषायमाणः। वृषयमाण इति वृषयऽमाणः। वृषभः। तुराषाट्। घृतप्रुषेति घृतऽप्रुषा। मनसा। मोदमानाः। स्वाहा। देवाः। अमृताः। मादयन्ताम्॥४६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (स्तोकानाम्) = [स्तोक - कण- बिन्दु] एक-एक कण के रूप में उत्पन्न हुए हुए (इन्दु प्रति) = [ इन्द to be powerful ] शक्तिशाली बनानेवाले सोम को लक्ष्य बनाकर चलनेवाला, अर्थात् सोम के एक-एक कण का ध्यान करनेवाला यह आङ्गिरस (शूरः) = शूरवीर बनता है। २. (इन्द्रः) = यह इन्द्रियों को वश में करनेवाला और इन्द्र नामवाला राजा (वृषायमाणः) = बलवान् पुरुष की भाँति आचरण करता है। (वृषभ:) = शक्तिशाली होता है, प्रजाओं पर सुखों की वर्षा करता है। ३. (तुराषाट्) = [ तूर्णं सहते - उ० तुरान् हिंसकान् सहते - द०] शीघ्रता से हिंसा करनेवाले काम-क्रोधादि अन्तःशत्रुओं का पराभव करता है। ४. वस्तुतः वीर्य के कण-कण की रक्षा करनेवाला शूरवीर, जितेन्द्रिय, शक्तिशाली की भाँति आचरण करता हुआ, प्रजाओं पर सुखों का वर्षक, शत्रुओं का पराभावयिता राजा ही प्रजा की रक्षा कर पाता है('ब्रह्मचर्येण राजा राष्ट्रं वि रक्षति') । विलासी राजा प्रजारक्षण में समर्थ नहीं होता। ५. इस राज्यरूप महादेव कार्य को राजा अकेला नहीं कर सकता, वह इस कार्य के लिए सात वा आठ मन्त्रियों को अपने साथ नियत करता है। राजा 'इन्द्र' है, तो ये मन्त्री 'देव' कहलाते हैं। ये देव भी (घृतप्रुषा) = [घृ क्षरण, दीप्ति] मलक्षरण व नैर्मल्य तथा दीप्ति से सिक्त [प्रुष् to sprinkle] (मनसा) = मन से (मोदमाना:) = हर्ष का अनुभव करते हुए (मादयन्ताम्) = प्रजा को आनन्दित करें। ६. कैसे देव? [क] (स्वाहा देवाः) = [स्वाहाकृतयो देवा: स्वाहादेवाः] प्रजा के हित के लिए स्व का त्याग करनेवाले देव, तथा [ख] (अमृताः) = [नास्ति मृतं मरणं येषां म०] जो किन्हीं भी विषयों के पीछे मर नहीं रहे, अर्थात् विषयासक्त नहीं हैं। एवं, मन्त्रियों के तीन विशेषण हैं, ये नैर्मलय व दीप्ति से सिक्त मन से मोदमान हों, प्रजाहित के लिए स्वार्थ का त्याग करनेवाले हों तथा विषयों के पीछे मरनेवाले न हों। इन तीन विशेषणों से विशिष्ट देव ही प्रजारक्षणरूप कार्य में राजा के उत्तम सहायक हो सकते हैं।
Essence
भावार्थ-' इन्द्र' राजा है, वह ब्रह्मचारी बनता है, शक्तिशाली बनकर कामादि शत्रुओं का संहार करता है। उसके मन्त्री 'देव' हैं। ये भी निर्मल मनवाले, प्रसन्नचित्त, स्वार्थ से ऊपर उठे हुए, विषयों से अछूते हैं।
Subject
इन्द्र तथा देव