Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 44

90 Mantra
20/44
Devata- त्वष्टा देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वष्टा॒ दध॒च्छुष्म॒मिन्द्रा॑य॒ वृष्णे॑ऽपा॒कोऽचि॑ष्टुर्य॒शसे॑ पु॒रूणि॑। वृषा॒ यज॒न्वृष॑णं॒ भूरि॑रेता मू॒र्द्धन् य॒ज्ञस्य॒ सम॑नक्तु॒ दे॒वान्॥४४॥

त्वष्टा॑। दध॑त्। शुष्म॑म्। इन्द्रा॑य। वृष्णे॑। अपा॑कः। अचि॑ष्टुः। य॒शसे॑। पु॒रूणि॑। वृषा॑। यज॑न्। वृष॑णम्। भूरि॑रेता॒ इति॒ भूरि॑ऽरेताः। मू॒र्द्धन्। य॒ज्ञस्य॑। सम्। अ॒न॒क्तु॒। दे॒वान् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
त्वष्टा दधच्छुष्ममिन्द्राय वृष्णेपाकोचिष्टुर्यशसे पुरूणि । वृषा यजन्वृषणम्भूरिरेता मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान् ॥

त्वष्टा। दधत्। शुष्मम्। इन्द्राय। वृष्णे। अपाकः। अचिष्टुः। यशसे। पुरूणि। वृषा। यजन्। वृषणम्। भूरिरेता इति भूरिऽरेताः। मूर्द्धन्। यज्ञस्य। सम्। अनक्तु। देवान्॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यदि गतमन्त्र की भावना के अनुसार हमारी वाणी सर्वव्यापक प्रभु का जप करनेवाली बनती है तो हम उस प्रभु की कृपा से वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते और इन्द्रियों को वश में कर सकने के कारण 'इन्द्र' व परिणामत: 'वृषभ' बनते हैं, वासना से ऊपर उठकर सबपर सुखों की वर्षा करनेवाले बनते हैं। इस (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए, वृष्णे सुखों की वर्षा करनेवाले के लिए (त्वष्टा) = वह दिव्य गुणों का निर्माता प्रभु (शुष्मम्) = शत्रुशोषक शक्ति को दधत् धारण करता है। इसे वह शक्ति प्राप्त कराता है, जिससे यह सब शत्रुओं को जीत पाता है। २. वह (अपाक:) = [ न विद्यते अन्यः पाकः यस्मात् स:-उ०] अत्यन्त प्रशंसनीय [अनुत्तम] (अचिष्टुः) = [अञ्चनशीलः सर्वत्र गतः - म० ] सर्वव्यापक प्रभु (यशसे) = इस इन्द्र के यश के लिए (पुरूणि) पालनात्मक व पूरणात्मक कर्मों को इसमें आहित करता है। इन कर्मों को करता हुआ यह इन्द्र यशस्वी बनता है और ३. (वृषणम्) = सब शक्तियों का सेवन करनेवाले प्रभु की (यजन्) = पूजा व सङ्गतिकरण करता हुआ यह (वृषा) = शक्तिशाली बनता है ४. (भूरिरेताः) = भरण-पोषण करनेवाले रेतस्वाला होता है [ रेतस् वीर्य] । ५. (यज्ञस्य मूर्धन्) सदा उत्तम कर्मों के अग्रभाग में स्थित होता है और ६. (देवान् समनक्तु) = दिव्य गुणों के साथ अपने को सङ्गत करता है।
Essence
भावार्थ- प्रभु के उपासन से बल प्राप्त होता है। हम यशस्वी कार्यों को करनेवाले बनते हैं और हम दिव्य गुणों से अपने जीवन को समलंकृत कर पाते हैं।
Subject
भूरिरेताः