Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 42

90 Mantra
20/42
Devata- दैव्याध्यापकोपदेशकौ देवते Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दैव्या॒ मिमा॑ना॒ मनु॑षः पुरु॒त्रा होता॑रा॒विन्द्रं॑ प्रथ॒मा सु॒वाचा॑। मू॒र्द्धन् य॒ज्ञस्य॒ मधु॑ना॒ दधा॑ना प्रा॒चीनं॒ ज्योति॑र्ह॒विषा॑ वृधातः॥४२॥

दैव्या॑। मिमा॑ना। मनु॑षः। पु॒रु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा। होता॑रौ। इन्द्र॑म्। प्र॒थ॒मा। सु॒वाचेति॑ सु॒ऽवाचा॑। मू॒र्द्धन्। य॒ज्ञस्य॑। मधु॑ना। दधा॑ना। प्रा॒चीन॑म्। ज्योतिः॑। ह॒विषा॑। वृ॒धा॒तः॒ ॥४२ ॥

Mantra without Swara
दैव्या मिमाना मनुषः पुरुत्रा होताराविन्द्रम्प्रथमा सुवाचा । मूर्धन्यज्ञस्य मधुना दधाना प्राचीनञ्ज्योतिर्हविषा वृधातः ॥

दैव्या। मिमाना। मनुषः। पुरुत्रेति पुरुऽत्रा। होतारौ। इन्द्रम्। प्रथमा। सुवाचेति सुऽवाचा। मूर्द्धन्। यज्ञस्य। मधुना। दधाना। प्राचीनम्। ज्योतिः। हविषा। वृधातः॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि 'देवानां देव' का यजन करके ये पति-पत्नी 'सुरुक्म' उत्तम दीप्तिवाले बनते हैं। ये (दैव्या) = [देवस्य इमौ] परमात्मा के ही हो जाते हैं। २. (मिमाना) = अपने जीवन में ये सदा 'यज्ञं निर्मिमाणौ' श्रेष्ठ कर्मों को करनेवाले होते हैं। अथवा सब कर्मों को माप-तोलकर करनेवाले होते हैं, अर्थात् 'युक्त - चेष्ट' होते हैं । ३. (मनुषः पुरुत्रा) = ज्ञान से ज्ञान के द्वारा ये अपना पालन व पूरण करनेवाले होते हैं [पृ पालनपूरणयो:, त्रा-रक्षणे ] । ४. (होतारौ) = ये सदा दानपूर्वक अदन करनेवाले होते हैं । ५. (इन्द्र प्रथमा) = दानपूर्वक अदन से उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को विस्तृत करनेवाले होते हैं। हवि के द्वारा ही वस्तुत: 'प्रभुपूजन' होता है अथवा ये अपने जीवन में प्रभु का विस्तार करनेवाले होते हैं । ६. (सुवाचा) = सदा उत्तम वाणीवाले होते हैं । ७. ये (मधुना) = अपने जीवन के माधुर्य से, माधुर्यमयी क्रियाओं से (यज्ञस्य मूर्धन्) = उत्तम कर्मों के अग्रभाग में (दधाना) = अपने को स्थापित करते हैं, अर्थात् ये उत्तम क्रियाओंवाले होते हैं और अत्यन्त माधुर्यवाले होते हैं। ८. इस प्रकार ये (प्राचीनं ज्योतिः) = [प्राग् अञ्जनम्] निरन्तर अग्रगति व उन्नति के साधक ज्ञान को (हविषा) = दानपूर्वक अदन के द्वारा-यज्ञशेष के सेवन के द्वारा, (वृधातः) = बढ़ानेवाले होते हैं। स्वार्थ मनुष्य के ज्ञान को नष्ट करता है। मनुष्य जितना जितना स्वार्थ व काम से ऊपर उठता है उतना उतना उसका ज्ञान चमकता है।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु के बनें, सब क्रियाओं को मापकर करें, अति में न जाएँ, ज्ञान से अपना त्रण करें, होता बनें, प्रभु का अपने में विस्तार करें, उत्तम वाणीवाले हों, माधुर्य के साथ यज्ञों के अग्रभाग में स्थित हों, उस ज्ञान को प्राप्त करें, जो हमारी अग्रगति का साधन बनता है। ,
Subject
प्राचीनं ज्योति