Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 38

90 Mantra
20/38
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒डि॒तो दे॒वैर्हरि॑वाँ२ऽअभि॒ष्टिरा॒जुह्वा॑नो ह॒विषा॒ शर्द्ध॑मानः। पु॒र॒न्द॒रो गो॑त्र॒भिद् ्वज्र॑बाहु॒राया॑तु य॒ज्ञमुप॑ नो जुषा॒णः॥३८॥

ई॒डि॒तः। दे॒वैः। हरि॑वा॒निति॒ हरि॑ऽवान्। अ॒भि॒ष्टिः। आ॒जुह्वा॑न॒ इत्या॒ऽजुह्वा॑नः। ह॒विषा॑। शर्द्ध॑मानः। पु॒र॒न्द॒र इति॑ पुरम्ऽद॒रः। गो॒त्र॒भिदिति॑ गोत्र॒ऽभित्। वज्र॑बाहु॒रिति॒ वज्र॑ऽबाहुः। आ। या॒तु॒। य॒ज्ञम्। उप॑। नः॒। जु॒षा॒णः ॥३८ ॥

Mantra without Swara
ईडितो देवैर्हरिवाँऽअभिष्टिराजुह्वानो हविषा शर्धमानः । पुरन्दरो गोतभिद्वज्रबाहुरा यातु यज्ञमुप नो जुषाणः ॥

ईडितः। देवैः। हरिवानिति हरिऽवान्। अभिष्टिः। आजुह्वान इत्याऽजुह्वानः। हविषा। शर्द्धमानः। पुरन्दर इति पुरम्ऽदरः। गोत्रभिदिति गोत्रऽभित्। वज्रबाहुरिति वज्रऽबाहुः। आ। यातु। यज्ञम्। उप। नः। जुषाणः॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अपने जीवन को गतमन्त्र के अनुसार बनानेवाला व्यक्ति (देवैः ईडितः) = देवों से स्तुत होता है। विद्वान् लोग इसकी प्रशंसा करते हैं। अथवा (देवैः) = दिव्य गुणों के हेतु से [हेतु में तृतीया] यह [ईडितमस्य अस्ति इति] प्रभु की स्तुति करनेवाला होता है। प्रभु स्तुति के द्वारा यह दिव्य गुणों को अपने में धारण करनेवाला होता है। २. (हरिवान्) = प्रशस्त इन्द्रियरूप घोड़ोंवाला बनता है। ३. (अभिष्टिः) = [अभिगमनवान् - उ० ] कामादि शत्रुओं पर यह आक्रमण करनेवाला होता है। ४. (आजुह्वानः) = समन्तात् यज्ञों को करनेवाला बनता है-यज्ञ इसका स्वभाव हो जाता है। ५. (हविषा) = इस यज्ञ की वृत्ति से, दानपूर्वक अदन की वृत्ति से - यह (शर्द्धमानः) = [शर्ध इति बलनाम अतिबलायमान :- म० ] अत्यन्त बलवान् की भाँति आचरण करनेवाला होता है। ६. (पुरन्दरः) = इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि में असुरों से बनाये गये पुरों का यह विदारण करनेवाला होता है। यह असुरों की तीनों पुरियों का विध्वंस कर डालता है। वासनाओं को नष्ट करके यह 'पुरन्दर' बनता है। ७. (गोत्रभित्) = जीवनयात्रा में पर्वत के समान आ जानेवाले वासनारूप विघ्नों को यह विदीर्ण करता है, बड़े-से-बड़े विघ्न को यह नष्ट करनेवाला होता है । ८. (वज्रबाहुः) = इसी उद्देश्य से क्रियाशीलतारूप वज्र को हाथ में लेकर चलता है । ९. यह (यज्ञं जुषाण:) = यज्ञों का प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ (नः) = हमारे (उप) = समीप (आयातु) = आये । यज्ञों का सेवन करते हुए ही हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं।
Essence
भावार्थ - उपासना से दिव्य गुणों को प्राप्त करते हुए हम यज्ञमय जीवनवाले हों। इससे हमारी शक्ति बढ़ेगी और अन्ततः हम प्रभु को प्राप्त करेंगे।
Subject
पुरन्दरः