Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 37

90 Mantra
20/37
Devata- तनूनपाद्देवता देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नरा॒शꣳसः॒ प्रति॒ शूरो॒ मिमा॑न॒स्तनू॒नपा॒त् प्रति॑ य॒ज्ञस्य॒ धाम॑। गोभि॑र्व॒पावा॒न् मधु॑ना सम॒ञ्जन् हिर॑ण्यैश्च॒न्द्री य॑जति॒ प्रचे॑ताः॥३७॥

नरा॒शꣳसः॑। प्रति॑। शूरः॑। मिमा॑नः। तनू॒नपा॒दिति॒ तनू॒ऽनपा॑त्। प्रति॑। य॒ज्ञस्य॑। धाम॑। गोभिः॑। व॒पावा॒निति॑ व॒पाऽवा॑न्। मधु॑ना। स॒म॒ञ्जन्निति॑ सम्ऽअ॒ञ्जन्। हिर॑ण्यैः। च॒न्द्री। य॒ज॒ति॒। प्रचे॑ता॒ इति॒ प्रऽचे॑ताः ॥३७ ॥

Mantra without Swara
नराशँसः प्रति शूरो मिमानस्तनूनपात्प्रति यज्ञस्य धाम । गोभिर्वपावान्मधुना समञ्जन्हिरण्यैश्चन्द्री यजति प्रचेताः ॥

नराशꣳसः। प्रति। शूरः। मिमानः। तनूनपादिति तनूऽनपात्। प्रति। यज्ञस्य। धाम। गोभिः। वपावानिति वपाऽवान्। मधुना। समञ्जन्निति सम्ऽअञ्जन्। हिरण्यैः। चन्द्री। यजति। प्रचेता इति प्रऽचेताः॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का आङ्गिरस चारों मोक्ष द्वारों को खोलनेवाला नराशंसः - ( नरै: आ=समन्तात् शंस्यते) सर्वत्र मनुष्यों से प्रशंसित होता है। यह २ प्रति - शूर:- प्रत्येक वासना व शत्रु से मुकाबला करनेवाला वीर होता है। ३. प्रतिमिमानः = कार्य को माप-तोलकर करनेवाला होता है और ४. इसीलिए तनू-न-पात् शरीर को वह गिरने नहीं देता, शरीर को पूर्ण स्वस्थ बनाये रखता है । ५. यज्ञस्य धाम - (यज्ञो वै विष्णुः) सृष्टियज्ञ को करनेवाले सर्वव्यापक 'यज्ञ' नामक प्रभु का यह घर ( निवासस्थान) बनता है । ६. जब यह अपने हृदय में प्रभु को बिठा लेता है तब गोभिः = उस हृदयस्थ प्रभु से उच्चारण की गई वेदवाणियों के द्वारा यह वपावान्- (वप् - बोना) प्रशस्त गुणों के बीजों को बोनेवाला होता है। अपने अन्दर उत्तम गुणों का विकास करता है। ७. मधुना समञ्जन् = माधुर्य से अपने जीवन को अलंकृत करता है। इसका व्यवहार व वाणी अत्यन्त मधुर होते हैं। अन्दर गुण हों तो वाणी व व्यवहार में माधुर्य होना ही चाहिए। ८. हिरण्यै:- (हितरमणीयैः) हितरमणीय ज्ञानों के द्वारा, वीर्य के द्वारा शक्तियुक्त होने के कारण चन्द्री - यह सदा आह्लाद - प्रसन्नता की वृत्तिवाला होता है। ९. यजति यज्ञशील होता है- (क) बड़ों का आदर करता है, (ख) बराबरवालों से मिलकर चलता है तथा (ग) देने की शक्तिवाला होता है। १०. प्रचेताः - यह प्रकृष्ट चेतनावाला—उत्कृष्ट ज्ञानी बनता है। जीवन को बड़ी समझदारी से उन्नति - पथ पर ले चलता है, कभी असावधान नहीं होता।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु को अपने में धारण करनेवाले बनें, उसकी ज्ञानवाणियों से जीवन में सद्गुणों के बीज बोएँ। माधुर्यवाले हों। सदा आह्लादमय, यज्ञशील व प्रचेता बनें।
Subject
यज्ञ का धाम