Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 3

90 Mantra
20/3
Devata- सभोशो देवता Rishi- अश्विनावृषी Chhand- निचृदतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। अ॒श्विनो॒र्भैष॑ज्येन॒ तेज॑से ब्रह्मवर्च॒साया॒भि षि॑ञ्चामि॒ सर॑स्वत्यै॒ भैष॑ज्येन वी॒र्याया॒न्नाद्याया॒भि षि॑ञ्चा॒मीन्द्र॑स्येन्द्रि॒येण॒ बला॑य श्रि॒यै यश॑से॒ऽभि षि॑ञ्चामि॥३॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। अ॒श्विनोः॑। भैष॑ज्येन। तेज॑से। ब्र॒ह्म॒व॒र्च॒सायेति॑ ब्रह्मऽवर्च॒साय॑। अ॒भि। सि॒ञ्चा॒मि॒। सर॑स्वत्यै। भैष॑ज्येन। वी॒र्या᳖य। अ॒न्नाद्या॒येत्य॒न्नऽअद्या॑य। अ॒भि। सि॒ञ्चा॒मि॒। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒येण॑। बला॑य। श्रि॒यै। यश॑से। अ॒भि। सि॒ञ्चा॒मि॒ ॥३ ॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । अश्विनोर्भैषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभि षिञ्चामि सरस्वत्यै भैषज्येन वीर्यायान्नाद्यायाभिषिञ्चामिऽइन्द्रस्येन्द्रियेण बलाय श्रियै यशसेभिषिञ्चामि ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। अश्विनोः। भैषज्येन। तेजसे। ब्रह्मवर्चसायेति ब्रह्मऽवर्चसाय। अभि। सिञ्चामि। सरस्वत्यै। भैषज्येन। वीर्याय। अन्नाद्यायेत्यन्नऽअद्याय। अभि। सिञ्चामि। इन्द्रस्य। इन्द्रियेण। बलाय। श्रियै। यशसे। अभि। सिञ्चामि॥३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सवितुः) = सबके उत्पादक व प्रेरक देवस्य दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु के (प्रसवे) = अनुज्ञा में (त्वा अभिषिञ्चामि) = तेरा अभिषेक करता हूँ, अर्थात् तूने वेद में दिये गये प्रभु के आदेश के अनुसार शासन करना है। २. (अश्विनोः बाहुभ्याम्) = प्राणापान के प्रयत्न के हेतु से मैं तेरा अभिषेक करता हूँ, अर्थात् तू अपने प्रयत्न से कमाकर खानेवाला है। तेरी यह विशेषता भी तुझे इस शासनाधिकार के योग्य बनाती है। तू कोश को प्रजा के लिए (धेनु) = ' दूध पिलानेवाली' समझता है तो अपने लिए उस कोश को तू 'वशा' - बन्ध्या गौ के समान समझता है। तू किसी प्रकार के विषयभोगों के लिए उस कोश का विनियोग नहीं करता । यह बात भी तुझे अभिषेक के योग्य बनाती है। ३. (पूष्णोः हस्ताभ्याम्) = पूषा के हाथों से भी मैं तेरा अभिषेक करता हूँ, क्योंकि तू किसी भी वस्तु का उतना ही ग्रहण करता है जितना पोषण के लिए पर्याप्त हो । ४. (अभिषिञ्चामि) = मैं तेरा अभिषेक इसलिए करता हूँ कि (अश्विनोः) = प्राणापान की (भैषज्येन) = चिकित्सा के द्वारा (तेजसे) =- तेरे शरीर में नीरोगता के कारण तेजस्विता का प्रादुर्भाव हुआ है तथा ब्रह्मवर्चसाय तेरे स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क के कारण ज्ञानाध्ययन की सम्पत्ति का प्रादुर्भाव हुआ है। तू शरीर से तेजस्वी है तो मस्तिष्क से ब्रह्मवर्चस्वी बना है । ५. (अभिषिञ्चामि) = मैं तेरा अभिषेक करता हूँ चूँकि (सरस्वत्यै भैषज्येन) = सरस्वती-विद्याधिदेवता' के चिकित्सन के द्वारा वीर्याय तू शक्तिसम्पन्न = तू बना है तथा (अन्नाद्याय) = तुझमें अन्न के खाने की शक्ति ठीक बनी है। तू मन्दाग्नि नहीं हो गया है। ज्ञान को विलासवृत्ति नष्ट करती है और इसके विनाश से इसकी शक्ति ठीक बनी रहती है। आहार-विहार के ठीक होने से यह मन्दाग्नि नहीं हो जाता। मन्दाग्नि पुरुष कभी भी शासन के लिए उपयुक्त नहीं होता, क्योंकि वह पग-पग पर खिझने की वृत्तिवाला होता है । ६. (अभिषिञ्चामि) = मैं तेरा इसलिए अभिषेक करता हूँ कि तू (इन्द्रस्य इन्द्रियेण) = इन्द्र की इन्द्रियों के द्वारा, अर्थात् स्वाधीन इन्द्रियों के द्वारा (बलाय) = बलसम्पन्नता के लिए समर्थ हुआ है, (श्रियै) = तेरा प्रत्येक कार्य शोभासम्पन्न है तथा (यशसे) = तू अपने कार्यों के साफल्य से यशः सम्पन्न बना है। ('जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः') = जितेन्द्रिय राजा ही तो प्रजाओं को वश में स्थापित करने में समर्थ होता है।
Essence
भावार्थ - अभिषेक के योग्य राजा वह है जो - [क] परमेश्वर की अनुज्ञा में चलता है, [ख] अपने प्राणापान के प्रयत्न से अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करता है, [ग] पोषण से अधिक वस्तु का ग्रहण नहीं करता, [घ] प्राणापान के शक्तिवर्धन से तेजस्वी व ब्रह्मवर्चस्वी बना है, [ङ] ज्ञान से अपने को पवित्र करके वीर्यसम्पन्न तथा प्रज्वलित जाठराग्निवाला हुआ है, [च] इन्द्रियों को अपने अधीन रखके तू 'बल, श्री व यश: ' सम्पन्न बना है।
Subject
अभिषेक