Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 29

90 Mantra
20/29
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
धा॒नाव॑न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव॑न्तमु॒क्थिन॑म्। इन्द्र॑ प्रा॒तर्जु॑षस्व नः॥२९॥

धा॒नाव॑न्त॒मिति॑ धा॒नाऽव॑न्तम्। क॒र॒म्भिण॑म्। अ॒पू॒पव॑न्त॒मित्य॑पू॒पऽव॑न्तम्। उ॒क्थिन॑म्। इन्द्र॑। प्रा॒तः। जु॒ष॒स्व॒। नः॒ ॥२९ ॥

Mantra without Swara
धानावन्तङ्करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः ॥

धानावन्तमिति धानाऽवन्तम्। करम्भिणम्। अपूपवन्तमित्यपूपऽवन्तम्। उक्थिनम्। इन्द्र। प्रातः। जुषस्व। नः॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का 'किन्त्व' प्रभु से प्रार्थना करता है कि (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशील प्रभो! हे (प्रातः) = [प्रा पूरणे] हममें सब अच्छाइयों को भरनेवाले प्रभो! आप (नः) = हमें (जुषस्व) = प्रेम करनेवाले होओ, अर्थात् मैं आपका प्रिय बनूँ। जैसे सदा पढ़ाई में प्रथम निकलनेवाले पुत्र से पिता प्रेम करता है, इसी प्रकार मैं भी अपनी उत्तम क्रियाओं से प्रभु का प्रिय बनूँ। २.किस प्रकार के जीवनवाले मुझसे प्रभु प्रेम करें? (धानावन्तम्) = [धान= अवधान=ध्यान] उत्तम ध्यानवाले मुझको। जीवन यात्रा की पहली मंजिल में मेरा यही कर्त्तव्य होना चाहिए कि मैं माता-पिता व आचार्य से दिये जानेवाले ज्ञान को ध्यान से सुनूँ और ग्रहण करूँ। जीवन यात्रा की पहली मंजिल में 'ध्यान' ही मेरा आदर्श वाक्य हो । ३. अब जीवनयात्रा की दूसरी मंजिल में (करम्भिणम्) = [करेण दीयते] हाथों से दिये जानेवाले दान की वृत्तिवाले मुझसे आप प्रेम कीजिए। गृहस्थ में मैं सदा कुछ न कुछ दान देनेवाला बनूँ। 'करम्भ' शब्द का अर्थ 'दधिसक्तु' भी होता है। दधि व सक्तु [दही-सत्तू] आदि सात्त्विक पदार्थों का ही सेवन करनेवाला मैं आपका प्रेमपात्र बनूँ। ४. अब जीवन यात्रा के तीसरे प्रयाण में अपूपवन्तम् उत्तम इन्द्रियोंवाले मुझसे आप प्रेम कीजिए। गृहस्थ में थोड़े-बहुत मल से मलिन हुई हुई इन्द्रियों को वानप्रस्थ में मैं फिर से पवित्र बनाने के लिए प्रयत्नशील होता हूँ [इन्द्रियम् पूपः - ऐ० २।२४] । तीव्र तप के द्वारा इन्द्रियों को निर्मल बनानेवाला मैं आपका प्रिय बनूँ। ५. शुद्धेन्द्रिय बनकर (उक्थिनम्) = जीवन के चतुर्थाश्रम में निरन्तर आपके स्तोत्रों का उच्चारण करनेवाले मुझसे आप प्रेम कीजिए। सदा आपके स्तवन से अपने जीवन को पवित्र रखनेवाला मैं आपका प्रिय बनूँ ।
Essence
भावार्थ- प्रभु का प्रिय वह होता है जो - [क] ध्यानवाला होता है, [ख] दान देता है, [ग] इन्द्रियों को शुद्ध रखता है, तथा [घ] सदा प्रभु नाम स्मरण करनेवाला बनता है।
Subject
ध्यान-दान- शोधन -स्तवन