Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 28

90 Mantra
20/28
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सि॒ञ्चन्ति॒ परि॑ षिञ्च॒न्त्युत्सि॑ञ्चन्ति पु॒नन्ति॑ च।सुरा॑यै ब॒भ्वै्र मदे॑ कि॒न्त्वो व॑दति कि॒न्त्वः॥२८॥

सि॒ञ्चन्ति॒। परि॑। सि॒ञ्च॒न्ति॒। उत्। सि॒ञ्च॒न्ति॒। पु॒नन्ति॑। च॒। सुरा॑यै। ब॒भ्र्वै। मदे॑। कि॒न्त्वः। व॒द॒ति॒। कि॒न्त्वः ॥२८ ॥

Mantra without Swara
सिञ्चन्ति परि षिञ्चन्त्युत्सिञ्चन्ति पुनन्ति च । सुरायै बर्भ्वै मदे किन्त्वो वदति किन्त्वः ॥

सिञ्चन्ति। परि। सिञ्चन्ति। उत् । सिञ्चन्ति। पुनन्ति। च। सुरायै। बभ्वै्र। मदे। किन्त्वः। वदति। किन्त्वः॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार सोम की रक्षा करनेवाले व्यक्ति इस सोम को (सिञ्चन्ति) = शरीर में ही सिक्त करते हैं, (परिषिञ्चन्ति) = शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों में इसे सिक्त करने के लिए यत्नशील होते हैं उत्सिञ्चन्ति = और अन्ततः इसे ऊर्ध्वगति के द्वारा मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि में सिक्त करते हैं। अग्नि में जैसे घृत डालते हैं, उसी प्रकार ये मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि में इस सुरक्षित सोम को समिधा के रूप में रखते हैं और उसे दीप्त करने का प्रयत्न करते । २. इस प्रकार ये व्यक्ति - ज्ञानाग्नि में सोम का सेचन करके ज्ञानवृद्धि के द्वारा (पुनन्ति च) = अपने को पवित्र करते हैं । ३. इस ज्ञान के द्वारा अपने को पवित्र करके वे (सुरायै) = [सुर् to shine] चमकने के लिए होते हैं, ज्ञान की दीप्ति से मनुष्य क्यों न चमकेगा ? क्षात्रबल से ब्रह्मबल की दीप्ति कहीं अधिक है। चमकने के साथ यह (बभ्रुवै) = उत्तम भरण व पोषण के लिए होता है। मस्तिष्क में 'ब्रह्म' [ज्ञान] है तो इसके शरीर में 'क्षत्र' [बल] होता है। ज्ञान से वासनाओं के विनाश के कारण ही शरीर में शक्ति सुरक्षित रहती है। ४. इस प्रकार ज्ञान व शक्ति होने पर इसके जीवन में एक विशेष उल्लास होता है और (मदे) = उस उल्लास के होने पर यह अपने को ही प्रेरणा-सी देते हुए (वदति) = कहता है कि (किन्त्वः) = 'कस्य त्वम्' आज तू उस आनन्दमय प्रजापति परमात्मा का बना है। उस (कः) = 'अनिर्वचनीय परमात्मा' का बनने के कारण ही तेरा नाम (किन्त्वः) = इस प्रकार हो गया है।
Essence
भावार्थ- हम सोम को शरीर में सुरक्षित करें, अङ्ग-प्रत्यङ्ग में व्यापक रक्खें, उसकी ऊर्ध्वगति करें। इससे हम अपने जीवनों को पवित्र बनाएँ। ज्ञान की दीप्ति व शरीर का ठीक पोषण होने पर जो एक विशेष उल्लास प्राप्त होता है, उसे प्राप्त कर लेने पर हम अपने लिए कह सकेंगे कि 'तू आज उस आनन्दमय अनिर्वचनीय महिमावाले प्रभु का हो गया है', तेरा नाम ही 'किन्त्व' प्रसिद्ध हुआ है।
Subject
किन्त्वः