Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 26

90 Mantra
20/26
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अश्वतराश्विर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यत्रेन्द्र॑श्च वा॒युश्च॑ स॒म्यञ्चौ॒ चरतः स॒ह।तं लो॒कं पुण्यं॒ प्रज्ञे॑षं॒ यत्र॑ से॒दिर्न वि॒द्यते॑॥२६॥

यत्र॑। इन्द्रः॑। च॒। वा॒युः। च॒। स॒म्यञ्चौ॑। चर॑तः। स॒ह। तम्। लो॒कम्। पुण्य॑म्। प्र। ज्ञे॒षम्। यत्र॑। से॒दिः। न। वि॒द्यते॑ ॥२६ ॥

Mantra without Swara
यत्रेन्द्रश्च वायुश्च सम्यञ्चो चरतः सह । तँलोकम्पुण्यम्प्र ज्ञेषँयत्र सेदिर्न विद्यते ॥

यत्र। इन्द्रः। च। वायुः। च। सम्यञ्चौ। चरतः। सह। तम्। लोकम्। पुण्यम्। प्र। ज्ञेषम्। यत्र। सेदिः। न। विद्यते॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के पुण्यलोक का ही वर्णन करते हुए कहते हैं कि (यत्र) = जहाँ (इन्द्रः च वायुः च) = इन्द्र और वायु, अर्थात् बल की देवता तथा गति [ज्ञान] की देवता [गतेस्त्रयोऽर्थाःज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च] (सम्यञ्चौ) = सम्यक् विकासवाले होते हुए सह (चरतः) = साथ-साथ विचरते हैं, अर्थात् जहाँ सब लोग सबल तथा ज्ञानसम्पन्न हैं २. (तम्) = उस (पुण्यं लोकम्) = शुभ लोक को (प्रज्ञेषम्) = [प्रजानीयाम्] मैं जान पाऊँ, यत्र जिस लोक में (सेदि:) = अन्न के न प्राप्त होने से होनेवाला विनाश न विद्यते नहीं है। ३. राष्ट्र में सब मन्त्री राजा के साथ मिलकर इस प्रकार व्यवस्था करते हैं कि राष्ट्र में अन्न की कमी नहीं होती। राष्ट्र में कोई भी व्यक्ति सभी भूखा नहीं मरता । राजा ने जहाँ यह व्यवस्था करनी है कि सभी सबल हों [इन्द्र], ज्ञानसम्पन्न हों [वायु], वहाँ उसे सभी के लिए अन्न भी प्राप्त कराना चाहिए, आपस्तम्ब के शब्दों में 'नास्य विषये कश्चित् क्षुधयावसीदेत्' इसके राष्ट्र में कोई भी भूख से अवसन्न [मृत] न हो।
Essence
भावार्थ- पुण्यलोक में 'इन्द्र और वायु' का स्थापन होता है, अर्थात् वहाँ के निवासी सबल व सज्ञान होते हैं। इनमें कोई निर्बल व मूर्ख नहीं होता। अन्नाभाव से कोई मरता नहीं ।
Subject
इन्द्र+वायु