Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 22

90 Mantra
20/22
Devata- अग्निर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒पोऽअ॒द्यान्व॑चारिष॒ꣳ रसे॑न॒ सम॑सृक्ष्महि। पय॑स्वाग्न॒ऽआग॑मं॒ तं मा॒ सꣳसृ॑ज॒ वर्च॑सा प्र॒जया॑ च॒ धने॑न च॥२२॥

अ॒पः। अ॒द्य। अनु॑। अ॒चा॒रि॒ष॒म्। रसे॑न। सम्। अ॒सृ॒क्ष्म॒हि॒। पय॑स्वान्। अ॒ग्ने॒। आ। अ॒ग॒म॒म्। तम्। मा॒। सम्। सृ॒ज॒। वर्च॑सा। प्र॒जयेति॑ प्र॒जया॑। च॒। धने॑न। च॒ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
अपोऽअद्यान्वचारिषँ रसेन समसृक्ष्महि । पयस्वानग्न आगमन्तं मा सँ सृज वर्चसा प्रजया च धनेन च ॥

अपः। अद्य। अनु। अचारिषम्। रसेन। सम्। असृक्ष्महि। पयस्वान्। अग्ने। आ। अगमम्। तम्। मा। सम्। सृज। वर्चसा। प्रजयेति प्रजया। च। धनेन। च॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के 'प्रभु-मिलन' के लिए (अद्य) = आज ही से मैंने (आपः अनु अचारिषम्) = कर्मों का व आप्त पुरुषों का अनुसरण किया है। मैंने सब प्रकार के आलस्य की भावना को परे फेंककर कर्मशीलता को स्वीकार किया है और आप्तजनों के ही सम्पर्क में रहने व उनके पदचिह्नों पर चलने का निश्चय किया है परिणामतः २. (रसेन) - [रसो वै सः] उस रसरूप आनन्दमय प्रभु से समसृक्ष्महि = संस्पृष्ट हुआ हूँ। कर्मशीलता व सत्संग मेरे प्रभु मिलन के साधन बने हैं। ३. हे (अग्ने) = हमारी सब उन्नतियों के साधक प्रभो! (पयस्वान्) = आप्यायन व वर्धनवाला होकर (आगमम्) = मैं आपके समीप आया हूँ। उन्नति करनेवाला पुरुष ही परमात्मा को पाता है। ४. तं मा उस मुझे आप वर्चसा शक्ति से प्रजया - उत्तम सन्तान से च= तथा धनेन च=धन से भी संसृज - संसृष्ट कीजिए। इस जीवन की उत्तमता के लिए [क] सबसे पहली वस्तु शक्ति है। शक्ति के बिना सब व्यर्थ है। [ख] अपने स्वास्थ्य के बाद संसार को सुन्दर बनानेवाली दूसरी वस्तु उत्तम सन्तान है । सन्तान उत्तम न हो तो घर नरक बन जाता है। [ग] संसार को चलाने के लिए धन भी चाहिए। उसके बिना संसार चलना सम्भव नहीं। स्वर्गतुल्य घर तभी बनता है जब शरीर में शक्ति हो, सन्तानें उत्तम हों तथा धन का अभाव न हो।
Essence
भावार्थ- हम क्रियाशीलता व आप्तपुरुषों के सङ्ग से रसरूप परमात्मा से मेल कर सकें। उन्नत होते हुए प्रभु को प्राप्त करें। वे प्रभु हमें 'शक्ति, उत्तम सन्तान व धन' दें।
Subject
रस से संसर्ग