Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 2

90 Mantra
20/2
Devata- सभोशो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
निष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्यास्वा। साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑। मृ॒त्योः पा॑हि वि॒द्योत् पा॑हि॥२॥

नि। स॒सा॒द॒। धृ॒तव्र॑त॒ इति॑ धृ॒तऽव्र॑तः। वरु॑णः। प॒स्त्या᳕सु। आ। साम्रा॑ज्या॒येति॒ साम्ऽरा॑ज्याय। सु॒क्रतु॒रिति॑ सु॒ऽक्रतुः॑। मृ॒त्योः। पा॒हि॒। वि॒द्योत्। पा॒हि॒ ॥२ ॥

Mantra without Swara
निषसाद घृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा । साम्राज्याय सुक्रतुः । मृत्योः पाहि विद्योत्पाहि॥

नि। ससाद। धृतव्रत इति धृतऽव्रतः। वरुणः। पस्त्यासु। आ। साम्राज्यायेति साम्ऽराज्याय। सुक्रतुरिति सुऽक्रतुः। मृत्योः। पाहि। विद्योत्। पाहि॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का 'क्षत्र का केन्द्र' बननेवाला व्यक्ति निषसाद निश्चय से व नम्रता के साथ सिंहासन पर बैठता है । २. धृतव्रतः यह व्रत का धारण करता है। 'प्रजारक्षण' ही इसका मुख्य व्रत होता है। प्रजारक्षण के लिए यह बाह्य शत्रुओं से बदला लेता है और अन्तःशत्रुओं को उचित दण्ड द्वारा सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करता है। ३. (वरुणः) = [क] यह प्रजाओं के द्वारा चुना जाता है। प्रजा ने रक्षण के लिए ही इसे चुना है, [ख] यह अपने को अपने कार्य में समर्थ होने के लिए श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करता है। ('वरुणो नाम वर: श्रेष्ठः'), [ग] यह प्रजाओं में द्वेषादि की वृत्तियों के निवारण का प्रयत्न करता है। ('वारयति इति वरुणः') । ४. इसी उद्देश्य से यह (आ) = समन्तात् चारों ओर (पस्त्यासु) = प्रजाओं में विचरण करता है। प्रजाओं में सदा भ्रमण करनेवाला राजा ही प्रजा का ठीक से रक्षण कर पाता है । ५. यह प्रजाओं में भ्रमण करनेवाला राजा ही (साम्राज्याय) = सम्यक् शासन के लिए होता है । उत्तमता से शासन के लिए राज्य में सर्वत्र भ्रमण करके स्वयं सब कुछ देखना आवश्यक है । ६. यह राजा (सुक्रतुः) = उत्तम कर्म व प्रज्ञावाला होता है। ७. इस राजा को आदेश देते हैं कि (मृत्योः पाहि) = तू प्रजाओं को मृत्यु से बचा । सफाई के उत्तम प्रबन्ध से तथा खान-पान की वस्तुओं की ठीक व्यवस्था से तू रोगों को न फैलने दे। ८. केवल रोगों से ही नहीं (विद्योत् पाहि) = [विद्युत्पाताद्रक्ष] विद्युत्पात आदि आधिदैविक आपत्तियों से भी तू राष्ट्र की रक्षा करनेवाला हो। वस्तुतः यदि वैयक्तिक पापों से आध्यात्मिक कष्ट होते हैं तो सामाजिक पापों से आधिभौतिक कष्ट आया करते हैं और राजा के अपराध अथवा राष्ट्रीय अपराध आधिदैविक आपत्तियों के कारण बनते हैं, अतः राजा ने राष्ट्र में उत्तम व्यवस्था के द्वारा राष्ट्र की आधिदैविक आपत्तियों से रक्षा करनी है।
Essence
भावार्थ-प्रजारक्षण के व्रत को लेकर राजा गद्दी पर बैठे। वह प्रज्ञापूर्वक कर्म करनेवाला हो। राष्ट्र को रोगों से होनेवाली मृत्यु से बचाए तथा विद्युत्पतन आदि आधिदैविक आपत्तियों से भी बचाए ।
Subject
धृत - व्रत