Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 17

90 Mantra
20/17
Devata- लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यद् ग्रामे॒ यदर॑ण्ये॒ यत्स॒भायां॒ यदि॑न्द्रि॒ये। यच्छू॒द्रे यदर्ये॒ यदेन॑श्चकृ॒मा व॒यं यदेक॒स्याधि॒ धर्म॑णि॒ तस्या॑व॒यज॑नमसि॥१७॥

यत्। ग्रामे। यत्। अर॑ण्ये। यत्। स॒भाया॑म्। यत्। इ॒न्द्रि॒ये। यत्। शू॒द्रे। यत्। अर्ये॑। यत्। एनः॑। च॒कृ॒म। व॒यम्। यत्। एक॑स्य। अधि॑। धर्म॑णि। तस्य॑। अ॒व॒यज॑न॒मित्य॑व॒ऽयज॑नम्। अ॒सि॒ ॥१७ ॥

Mantra without Swara
यद्ग्रामे यदरण्ये यत्सभायाँयदिन्द्रिये । यच्छूद्रे यदर्ये यदेनश्चकृमा वयँयदेकस्याधि धर्मणि तस्यावयजनमसि ॥

यत्। ग्रामे। यत्। अरण्ये। यत्। सभायाम्। यत्। इन्द्रिये। यत्। शूद्रे। यत्। अर्ये। यत्। एनः। चकृम। वयम्। यत्। एकस्य। अधि। धर्मणि। तस्य। अवयजनमित्यवऽयजनम्। असि॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ग्रामे) = ग्राम के विषय में (यत्) = जो (एनः) = पाप (वयम्) = हम चकृम कर बैठते हैं (तस्य) = उसके आप (अवयजनम् असि) = नाशक हैं [अवपूर्वो यजतिर्नाशने - उ० ] । ग्राम-विषयक अपराध 'नागरिक' नियमों का न पालना है। सड़क पर कूड़ा फेंक देना, मार्ग पर ठीक स्थान में न चलना, लापरवाही से जलती तीली आदि को इधर-उधर डाल देना, बड़ी ऊँची तान पर रेडियो बजाना' आदि सब नागरिक अपराध हैं । २. (अरण्ये) = अरण्य-वन के विषय में हम (यत्) = जो अपराध करते हैं, आप उस पाप से हमें दूर करें। वनविषयक मुख्य अपराध लकड़ी को काटना, परन्तु नये वृक्ष व वनस्पतियों को न लगाना है। हम एक वृक्ष को काटें तो दो लगाने का ध्यान करें, अन्यथा वनों का उच्छेद होकर वृष्टि का भी अवग्रह [ प्रतिबन्ध - रोक] हो जाएगा और लकड़ी भी अन्ततः समाप्त हो जाएगी। ३. (सभायाम्) = सभा के विषय में (यत्) = हम जो पाप करते हैं, उसे आप हमसे दूरे करनेवाले हैं। 'सभा' में शान्तभाव से न बैठना, बातें करते रहना, ध्यानभंग करनेवाली या अप्रासंगिक बात करना' ये सब सभा-विषयक पाप हैं, इनसे हम बचें। ४. (इन्द्रिये) = इन्द्रियों के विषय में (यत्) = जो पाप हम करते हैं, उसको आप हमसे दूर करनेवाले हैं। इन्द्रियों के विषय में अपराध यही है कि हम उनका दुरुपयोग करते हैं या उपयोग ही नहीं करते, अतः हम ज्ञानेन्द्रियों को सदा ज्ञान-प्राप्ति में लगाये रक्खें और कर्मेन्द्रियों को यज्ञादि उत्तम कर्मों में व्यापृत रक्खें। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यों के सहायक भूत ५. (शूद्रे) = समाज में श्रम के द्वारा जीविकोपार्जन करनेवाले शूद्रों के विषय में (यत्) = हम उनके लिए जो अपशब्द आदि का प्रयोग करते हुए, उन्हें मनुष्य न समझते हुए अपराध करते हैं, उसे हमसे दूर कीजिए । ६. (अर्ये) = वैश्यों के विषय में (यत्) = हम जो पाप करते हैं, उनसे उधार वस्तु लेकर समय पर रुपया नहीं देते अथवा देने से ही बचने का प्रयत्न करते हैं, उन पापों से हमें बचाइए । ७. घर में पति-पत्नी दो मुख्य पात्र हैं। दोनों ने मिलकर घर को बनाना है। एक ने अन्दर का काम सँभाला है, दूसरे ने बाहर का। इस प्रकार सम्मिलित उत्तरदायित्व होने पर भी दोनों के अलग-अलग विशिष्ट कर्तव्य हैं। ये ही उनके 'अधिधर्म' हैं। 'एक-दूसरे के अधिधर्मों के विषय में आलोचना करते रहना' यह अधिधर्म विषयक अपराध है, अतः (यत्) = जो (एकस्य) = एक के (अधिधर्मणि) = अधिधर्म के विषय में हम अपराध करते हैं (तस्य) = उसके (अवयजनम् असि) = आप नाश करनेवाले हैं।
Essence
भावार्थ- हम ग्राम और सभा आदि के विषय में हो जानेवाले अपराधों से बचने का प्रयत्न करें।
Subject
अव-यजन [ दूरीकरण ]