Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 14

90 Mantra
20/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यद्दे॑वा देव॒हेड॑नं॒ देवा॑सश्चकृ॒मा व॒यम्। अ॒ग्निर्मा॒ तस्मा॒देन॑सो॒ विश्वा॑न्मुञ्च॒त्वꣳह॑सः॥१४॥

यत्। दे॒वाः॒। दे॒व॒हेड॑न॒मिति॑ देव॒ऽहेड॑नम्। देवा॑सः। च॒कृ॒म। व॒यम्। अ॒ग्निः। मा॒। तस्मा॑त्। एन॑सः। विश्वा॑त्। मु॒ञ्च॒तु॒। अꣳह॑सः ॥१४ ॥

Mantra without Swara
यद्देवा देवहेडनन्देवासश्चकृमा वयम् । अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्वँहसः ॥

यत्। देवाः। देवहेडनमिति देवऽहेडनम्। देवासः। चकृम। वयम्। अग्रिः। मा। तस्मात्। एनसः। विश्वात्। मुञ्चतु। अꣳहसः॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (देवा:) = मन्त्र ११ में वर्णित तैतीस देवो! (देवासः) = ज्ञानी व समझदार होते हुए (वयम्) = हम (यत्) = जो (देवहेडनम्) = देवों का निरादर व अपराध चक्रमा करते हैं, कर बैठते । २. (विश्वात् तस्मात् एनस:) = उस सब अपराध से (अग्निः) = इन पृथिवीस्थ देवों का अग्रणी (अग्नि मा) = मुझे (मुञ्चतु) = मुक्त करे और इस पापमोचन के द्वारा (अंहसः) = उस पाप से होनेवाली पीड़ा से भी (मुञ्चतु) = मुझे मुक्त करे। ३. पृथिवीस्थ देवों के विषय में अपराध यही है कि हम उन देवों का ठीक प्रयोग व सेवन नहीं करते। मिट्टी से बचने का यत्न करते हैं। यह मिट्टी तो पृथिवी देवता का अंश है। उसे शरीर पर रमाने से शरीर के विष दूर होते हैं, परन्तु हम उससे घबराते हैं, घृणा भी करते हैं। इसी प्रकार 'जठरेण हुताशनम्'= पेट से अग्नि का सेवन मन्दाग्नि को दूर करता है। हम हाथों को तापते रहते हैं और अग्नि का लाभ नहीं उठा पाते। ४. शरीरस्थ सब देवांशों का ठीक प्रयोग होने से मनुष्य पापों व कष्टों से बचा रहता है।
Essence
भावार्थ- मेरे अन्दर आगे बढ़ने की भावना हो, यह भावना मुझे मार्गभ्रष्ट होने से बचाए और मैं पाप व कष्टों से बचा रहूँ ।
Subject
अग्नि द्वारा पापमोचन