Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 11

90 Mantra
20/11
Devata- उपदेशका देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्र॒या दे॒वा एका॑दश त्रयस्त्रि॒ꣳशाः सु॒राध॑सः। बृह॒स्पति॑पुरोहिता दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे। दे॒वा दे॒वैर॑वन्तु मा॥११॥

त्र॒याः। दे॒वाः। एका॑दश। त्र॒य॒स्त्रि॒ꣳशा इति॑ त्रयःऽत्रि॒ꣳशाः। सु॒राध॑स॒ इति॑ सु॒ऽराध॑सः। बृह॒स्पति॑पुरोहिता॒ इति॒ बृह॒स्पति॑ऽपुरोहिताः। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। स॒वे। दे॒वाः। दे॒वैः। अ॒व॒न्तु॒। मा॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
त्रया देवाऽएकादश त्रयस्त्रिँशाः सुराधसः । बृहस्पतिपुरोहिता देवस्य सवितुः सवे । देवा देवैरवन्तु मा ॥

त्रयाः। देवाः। एकादश। त्रयस्त्रिꣳशा इति त्रयःऽत्रिꣳशाः। सुराधस इति सुऽराधसः। बृहस्पतिपुरोहिता इति बृहस्पतिऽपुरोहिताः। देवस्य। सवितुः। सवे। देवाः। देवैः। अवन्तु। मा॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (त्रयाः) = [ त्रयोऽवयवा येषां ते] तीन प्रकार के (एकादश) = ग्यारह ग्यारह (देवा:) = देव (त्रयस्त्रिंशाः) = कुल मिलाकर तैतीस देव [जो ११ पृथिवीलोक में हैं, ११ अन्तरिक्षलोक में हैं तथा ११ द्युलोक में- ये सब ] (सुराधसः) = [ शोभनं राधो येषाम् ] उत्तम धनोंवाले हैं। उसउस धनवाले हैं जोकि [राध्नोति अनेन ] हमें सब प्रकार की उन्नतियों में सफल बनाते हैं। २. ये (बृहस्पतिपुरोहिता:) = [बृहस्पतिः सूर्यः पुरः पूर्व: हितो धृतो येषु - द०] सूर्यरूपी मुखियावाले (देवाः) = देव (देवस्य सवितुः) = उस दिव्य गुणोंवाले उत्पादक प्रभु की (सवे) = अनुज्ञा में वर्त्तमान हुए-हुए (देवैः) = अपनी दीप्तियों से व अपने दिव्य गुणों से (मा अवन्तु) = मेरी रक्षा करें। ३. संसार में कुल तैतीस देव हैं-ये 'पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक' में स्थिति के कारण तीन प्रकार हैं। एक- एक देव में उत्तम धन निहित है। इन तैतीस देवों में सूर्य मुख्य है। वस्तुत: सूर्य केन्द्र में है और सब देव सूर्य के चारों ओर घूमते हैं और इस प्रकार एक सौरलोक बनता है। प्रभु की अनुज्ञा में वर्त्तमान ये सब देव अपने दिव्य गुणों से हमारी रक्षा करें।
Essence
भावार्थ - तैतीस देव मेरे लिए सुराधस् हों, ये मेरी रक्षा करें।
Subject
३३ देव